Beingदलित

दलित प्रोफेसर वाघमारे के जातीय उत्पीड़न की अंतहीन दास्तान ।

प्रोफेसर सुनील वाघमारे 34 साल के नवजवान है ,जो महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के खोपोली कस्बे के के एम सी कॉलेज के कॉमर्स डिपार्टमेंट के हेड रहे है और इसी महाविद्यालय के वाईस प्रिंसीपल भी रहे है .

उत्साही ,ईमानदार और अपने काम के प्रति निष्ठावान . वे मूलतः नांदेड के रहने वाले है , वाणिज्य परास्नातक और बी एड करने के बाद वाघमारे ने वर्ष 2009 में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर इस कॉलेज को ज्वाइन किया था .वर्ष 2012 तक तो सब कुछ ठीक चला , मगर जैसे ही वर्तमान प्राचार्य डॉ एन बी पवार ने प्रिंसिपल का दायित्व संभाला .प्रोफेसर वाघमारे के लिये मुश्किलों का दौर शुरू हो गया .

प्राचार्य पवार प्रोफेसर वाघमारे को अपमानित करने का कोई न कोई मौका ढूंढ लेते ,बिना बात कारण बताओ नोटिस देना तो प्रिंसिपल का शगल ही बन गया ,वाघमारे को औसतन हर दूसरे महीने मेमो पकड़ा दिया जाता ,उनके सहकर्मियों को उनके विरुद्ध करने की भी कोशिस डॉ पवार की तरफ से होती रहती .

इस अघोषित उत्पीडन का एक संभावित कारण प्रोफेसर वाघमारे का अम्बेडकरी मूवमेंट से जुड़े हुए  होना तथा अपने स्वतंत्र व अलग विचार रखना था .संभवतः प्राचार्य डॉ पवार को यह भी ग्वारा नहीं था कि एक दलित प्रोफेसर उप प्राचार्य की हैसियत से उनके बराबर बैठे .इसका रास्ता यह निकाला गया कि वाघमारे को वायस प्रिंसिपल की ज़िम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया तथा अपने वाणिज्य विभाग तक ही सीमित कर दिया गया .

प्रोफेसर सुनील वाघमारे महाराष्ट्र के दलित समुदाय मातंग से आते है .वे  अपने कॉलेज में फुले ,अम्बेडकर और अन्ना भाऊ साठे के विचारों को प्रमुखता से रखते तथा बहुजन महापुरुषों की जयंतियों का आयोजन करते ,जिससे प्राचार्य खुश नहीं थे .देखा जाये तो वाघमारे और पवार के मध्य विचारधारा का मतभेद तो प्रारम्भ से ही रहा है . धीरे धीरे इस मतभेद ने उच्च शिक्षण संस्थाओं में व्याप्त जातिगत भेदभाव और उत्पीडन का स्वरुप धारण कर लिया और यह बढ़ता ही रहा .

प्रोफेसर वाघमारे ने अपने साथ हो रहे उत्पीडन की शिकायत अनुसूचित जाति आयोग  से करनी चाही तो कॉलेज की प्रबंधन समिति ने उनको रोक लिया तथा उन्हें उनकी शिकायतों का निवारण करने हेतु आश्वस्त भी किया ,लेकिन शिकायत निवारण नहीं हुई ,उल्टे प्रिंसिपल ने इसे अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और मौके की तलाश में रहे ताकि दलित प्रोफेसर वाघमारे को सबक सिखाया जा सके .

मन में ग्रंथि पाले हुए ,खार खाए प्रिंसिपल पवार को यह मौका इस साल 15 मार्च को प्रोफेसर वाघमारे के एक व्हाट्सएप मैसेज फोरवर्ड से मिल गया .

दरअसल 15 मार्च 2017 की रात तक़रीबन पौने बारह बजे के एम सी कॉलेज के एक क्लोज्ड ग्रुप पर प्रोफेसर वाघमारे ने एक मैसेज फोरवर्ड किया ,जिसका सन्देश था कि  "हम उन बातों को सिर्फ इसलिए क्यों मान ले कि वे किसी ने कही है ." साथ ही यह भी कि - " तुम्हारे पिता की दो दो जयन्तियां क्यों मनाई जाती है " कहा जाता है कि इसका संदर्भ शिवाजी महाराज की अलग अलग दो तिथियों पर जयंती समारोह मनाने को लेकर था .इस सन्देश पर ग्रुप में थोड़ी बहुत कहा सुनी हुई ,जो कि आम तौर पर हरेक ग्रुप में होती ही है .बाद में ग्रुप एडमिन प्रो अमोल नागरगोजे ने इस ग्रुप को ही डिलीट कर दिया .

बात आई गई हो गई क्योकि यह कॉलेज फेकल्टी का एक भीतरी समूह था जिसमे सिर्फ प्रोफेसर्स इत्यादि ही मेम्बर थे. लेकिन इसी दौरान प्राचार्य महोदय ने अपनी जातीय घृणा का इस्तेमाल कर लिया ,उन्होंने उस वक़्त इस सन्देश का स्क्रीन शॉट ले लिया जब ग्रुप में नागरगोजे तथा वाघमारे एवं प्रिंसिपल तीनों ही बचे थे . 

प्राचार्य ने इस स्क्रीन शॉट को योजनाबद्ध तरीके से प्रचारित किया ,जन भावनाओं को भड़काने का कुत्सित कृत्य करते हुए प्रोफेसर वाघमारे के खिलाफ अपराधिक षड्यंत्र रचते हुये उनके विरुद्ध भीड़ को तैयार किया .इस सामान्य से व्हाट्सएप फोरवर्ड को शिवाजी का अपमान कहते हुए एक प्रिंसिपल ने अपनी ही कॉलेज के एक प्रोफेसर के खिलाफ जन उन्माद भड़काया तथा उन्मादी भीड़ को कॉलेज परिसर में आ कर प्रोफेसर वाघमारे पर हिंसक कार्यवाही करने का भी मौका दे दिया .इतना ही नहीं बल्कि भीड़ के कॉलेज में घुसने से पूर्व ही प्रिंसिपल बाहर चले गये और आश्चर्यजनक रूप से सारे सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिए गये .

17 मार्च 2017 की दोपहर दर्जनों लोगों ने कॉलेज परिसर में प्रवेश किया तथा कॉलेज मेनेजमेंट के समक्ष प्रोफेसर वाघमारे की निर्मम पिटाई की ,उनको कुर्सी से उठा कर लोगों के कदमो के पास जमीन पर बैठने को मजबूर किया गया ,भद्दी गालियाँ दी गई ,मारते हुए जमीन पर पटक दिया और अधमरा करके जोशीले नारे चिल्लाने लगे . इस अप्रत्याशित हमले से वाघमारे बेहोश हो गये और उनके कानों से खून बहने लगा .बाद में पुलिस पंहुची जिसने लगभग घसीटते हुए वाघमारे को पुलिस जीप में डाला और थाने ले गये .थाने में ले जा कर पुलिस सुरक्षा देने के बजाय आनन फानन में वाघमारे पर ही प्रकरण दर्ज करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और पुलिस अभिरक्षा में धकेल दिया गया .

दलित प्रोफेसर सुनिल वाघमारे के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 295 ( ए ) अधिरोपित की गई ,उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने शिवाजी का अपमान करते हुए लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काया .ग्रुप एडमिन प्रोफेसर नागरगोजे की शिकायत पर केस दर्ज करवा कर वाघमारे को तुरंत गिरफ्तार कर हवालात में भेज दिया गया . बिना किसी प्रक्रिया को अपनाये कॉलेज प्रबन्धन समिति ने एक आपात बैठक बुला कर प्रोफेसर वाघमारे को उसी शाम तुरंत प्रभाव से निलम्बित करने का आदेश भी दे दिया . इससे भी जयादा शर्मनाक तथ्य यह है कि प्रोफसर वाघमारे को खोपोली छोड़ कर अपने परिवार सहित वापस नांदेड जाने को विवश किया गया .अब वे अपनी पत्नी ज्योत्स्ना और दो जुड़वा बेटियों के साथ लगभग गुमनाम जिंदगी जीने को मजबूर है .

कॉलेज प्रबंधन और प्राचार्य ने महाविद्यालय परिसर में घुस कर अपने ही एक प्रोफेसर पर किये गये हमले के विरुद्ध किसी प्रकार की कोई शिकायत अब तक दर्ज नहीं करवाई है ,जबकि संवाद मराठी नामक एक वेब चैनल पर हमले के फुटेज साफ देखे जा सकते है ,एक एक हमलावर साफ दिख रहा है ,मगर प्राचार्य मौन है ,वे हमलावरों के विरुद्ध कार्यवाही करने के बजाय वाघमारे के कैरियर और जीवन दोनों को नष्ट करने में अधिक उत्सुक नज़र आते है .

अगर व्हाट्सएप फोरवर्ड शिवाजी महाराज का अपमान था तो उस मैसेज का स्क्रीन शॉट ले कर पब्लिक में फैलाना क्या कानून सम्मत कहा जा सकता है  ? कायदे से तो कार्यवाही ग्रुप एडमिन नागरगोजे और स्क्रीन शॉट लेकर उसे आम जन के बीच फ़ैलाने वाले प्राचार्य पवार के विरुद्ध  भी होनी चाहिए ,मगर सिर्फ एक दलित प्रोफेसर को बलि का बकरा बनाया गया और उनके कैरियर ,सुरक्षा और गरिमा सब कुछ एक साज़िश के तहत खत्म कर दी गई है .

इस सुनियोजित षड्यंत्र के शिकार प्रोफेसर वाघमारे ने अपनी ओर से खोपोली पुलिस स्टेशन में 1 मई 2017 को प्राचार्य डॉ पवार के विरुद दलित अत्याचार अधिनियम सहित भादस की अन्य धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज करवाया है ,जिसके लिए भी उन्हें बहुत जोर लगाना पड़ा और अब कार्यवाही के नाम पर कुछ भी होता नज़र नहीं आ रहा है .

उच्च शिक्षा के इदारे में जातिगत भेदभाव और आपराधिक षड्यंत्र करते हुए एक दलित प्रोफेसर के जीवन और कैरियर को नष्ट करने के इतने भयंकर मामले को लेकर प्रतिरोध की जो आवाजें दलित बहुजन मूलनिवासी आन्दोलन की तरफ से उठनी चाहिए थी ,उनका नहीं उठना निहायत ही शर्मनाक बात है .पूरे देश के लोग महाराष्ट्र के फुले अम्बेडकरवादी संस्था ,संगठनो ,नेताओं से प्रेरणा लेते है और उन पर गर्व करते है ,मगर आज प्रोफेसर वाघमारे के साथ जो जुल्म हो रहा है ,उस पर महाराष्ट्र सहित देश भर के भीम मिशनरियों की चुप्पी अखरने वाली है .

आखिर वाघमारे के साथ हुए अन्याय को कैसे बर्दाश्त कर लिया गया ? छोटी छोटी बातों के लिए मोर्चे निकालने वाले लोग  सड़कों पर क्यों नहीं आये ? सड़क तो छोड़िये प्रोफेसर वाघमारे से मिलने की भी जहमत नहीं उठाई गई . देश भर में कई नामचीन दलित संगठन सक्रिय है ,उनमें से एक आध को छोड़ कर बाकी को तो मालूम भी नहीं होगा कि एक दलित प्रोफसर की जिंदगी कैसे बर्बाद की जा रही है .

जुल्म का सिलसिला अभी भी रुका नहीं है .शारीरिक हिंसा और मानसिक प्रताड़ना के बाद अब प्रोफेसर वाघमारे की आर्थिक नाकाबंदी की जा रही है .नियमानुसार उन्हें निलम्बित रहने के दौरान आधी तनख्वाह मिलनी चाहिए ,मगर वह भी रोक ली गई है ,ताकि हर तरफ से टूट कर प्रोफेसर वाघमारे जैसा होनहार व्यक्ति एक दिन पंखे के लटक कर जान दे दें ...और तब हम हाथों में मोमबत्तियां ले कर उदास चेहरों के साथ संघर्ष का आगाज करेंगे .कितनी विडम्बना की बात है कि एक इन्सान अपनी पूरी क्षमता के साथ अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ अकेला युद्धरत है ,तब साथ देने को हम तैयार नहीं है .शायद शर्मनाक हद तक हम सिर्फ सहानुभूति और शोक जताने में माहिर हो चुके है . 

आज जरुरत है प्रोफेसर सुनिल वाघमारे के साथ खड़े होने की ,उनके साथ जो साज़िश की गई ,उसका पर्दाफाश करने की ,लम्बे समय से जातिगत प्रताड़ना के विरुद्ध उनके द्वारा लड़ी जा रही लडाई को पहचानने तथा केएमसी कॉलेज के प्रिंसिपल की कारगुजारियों को सबके सामने ला कर उसे कानूनन सजा दिलाने की .

यह तटस्थ रहने का वक्त नहीं है .यह महाराष्ट्र में जारी मराठा मूक मोर्चों से डरने का समय नहीं है ,यह देश पर हावी हो रही जातिवादी मनुवादी ताकतों के सामने घुटने टेकने का समय नहीं है ,यह समय जंग का है ,न्याय के लिए संघर्ष का समय है . सिर्फ भाषणवीर बन कर फर्जी अम्बेडकरवादी बनने के बजाय सडक पर उतर कर हर जुल्म ज्यादती का मुकाबला करने की आज सर्वाधिक जरुरत  है .

बाद में मोमबतियां जलाने से बेहतर है कि हम जीते जी प्रोफेसर वाघमारे के साथ संघर्ष में शामिल हो जायें. मुझे पक्का भरोसा है वाघमारे ना डरेंगे और ना ही पीछे हटेंगे ,उनकी आँखों में न्याय के लिए लड़ने की चमक साफ देखी जा सकती है .बस इस वक़्त उन्हें हमारी  थोड़ी सी मदद की जरुरत है .

- भंवर मेघवंशी 
( लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता है ,जिनसे bhanwarmeghwanshi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है )
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हंश की मोटर में बैठा था दलित दूल्हा, दबंगों ने कर दी पिटाई



मध्य प्रदेश के छतरपुर के समीपस्थ ग्राम देरी में दलित दूल्हा को मोर के लुक में सजी कार पर सवार देखकर दबंग भड़क गये और उन्होंने दूल्हा सहित सात बरातियों की पिटाई कर दी. छतरपुर के ओरछा रोड थाना प्रभारी रामेश्वर दयाल ने बताया कि बसंत लाल बंसल की बेटी प्रियंका का विवाह महाराजुर के बाबूलाल बंसल के बेटे प्रकाश के साथ कल रात हो रहा था. दूल्हे की मोर लुक में सजी कार से गांव में बरात जा रही थी, तभी गांव के दंबगों ने बरात को रोका.



उन्होंने कहा कि जब दलितों ने इसका विरोध किया, तो अरविन्द सिंह, अखंड सिंह, पिन्टू विश्वकर्मा और पृथ्वी सिंह ने इनके साथ मारपीट कर दी, जिससे दूल्हे सहित सात लोगों को मामूली चोटें आई हैं.

दयाल ने बताया कि इन दबंगों ने शादी की वीडियोग्राफी कर रहे कैमरा मैन का कैमरा भी तोड़ दिया.


उन्होंने कहा कि घटना की खबर लगते ही पुलिस मौके पर पहुंची और एक आरोपी पृथ्वी सिंह को गिरफ्तार कर लिया, जबकि तीन आरोपी फरार हो गये.

दयाल ने बताया कि ओरछा रोड थाना पुलिस ने चारों आरोपियों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति :एससी-एसटी: एक्ट के तहत धारा 341, 294, 323, 427 एवं 506 के तहत मामला दर्ज कर लिया है और बाकी आरोपियों की तलाश शुरू कर दी है.
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सहारनपुर में क्यों 180 दलित परिवारों ने अपनाया बौद्ध धर्म??

सहारनपुर में हुई हिंसा के बाद चर्चा में आई भीम आर्मी पर दंगा फैलाने का आरोप लग रहा है. इसी से नाराज तीन गांव के 180 परिवारों ने सामूहिक रूप से हिंदू धर्म का त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया है. गांव वालों का कहना है कि पुलिस प्रशासन भीम आर्मी को बदनाम करने के लिए साजिश के तहत दंगा फैलाने का आरोप लगा रही हैं.

बता दें, कि सहारनपुर हिंसा के बाद गांव रूपड़ी, ईगरी व कपूरपुर के 180 परिवारों ने सामूहिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लिया है. उन्होंने देवी-देवताओं की मूर्तियां नहर में प्रवाहित कर दी. वे पुलिस-प्रशासन पर उत्पीड़न का आरोप लगा रहे हैं.

मौके पर पहुंचे पुलिस अधिकारियों ने दलितों को मनाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी. दलितों ने चेतावनी दी कि यदि भीम आर्मी के गिरफ्तार दलितों को नहीं छोड़ा गया तो सभी दलित हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लेंगे.

मूर्तियों को गंगा में प्रवाहित करते गांव वाले


कपूरपुर गांव के रहने वाले दीपक ने आरोप लगाया कि पुलिस-प्रशासन जानबूझकर दलितों का उत्पीड़न कर रहा है. उन्होंने कहा कि दलितों के नेता और भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ साजिश के तहत निशाना साधा जा रहा है.

गांव वालों ने पुलिस अधिकारियों को लिखित रुप से कहा कि दलित हिंदू धर्म में सुरक्षित नहीं हैं. वहीं गांव वालों ने कहा कि अगर प्रशासन ने दंगे में आरोपी बनाए गये दलितों को जल्द नहीं छोड़ा तो जिले के सारे दलित बौद्ध धर्म अपना लेंगे.
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चुनाव क़रीब होते हैं तो हम हिंदू बन जाते हैं, बाकी समय हमें चमार और बाल्मीकि समझा जाता हैं

"चुनाव करीब होते हैं तो हम हिन्दू बन जाते हैं और चुनाव ख़त्म होते ही हमारी पहचान एक बार फिर चमार, झिमर और वाल्मीकि रह जाती है." यह कहना है सहारनपुर के दलित लोकेश का. कैच न्यूज़ संवाददाता रविदास हॉस्टल के अहाते में पेड़ के नीचे लोकेश से बातचीत कर रहे थे. लोकेश सहित क़रीब 80 छात्र 16 कमरों के इस भवन में रहते हैं. ये सब शिक्षक की नौकरी की तैयारी कर रहे हैं.
एक स्थानीय कॉलेज में एमएससी की पढ़ाई कर रहे मोनू कुमार कहते हैं, "हमने भी भाजपा को वोट दिया था. अब देख रहे हैं कि वह क्या कर रही है." धीरे-धीरे और भी लोग हमारे पास इकट्ठा होने लगते हैं और बात बढ़ती नज़र आती है. रविदास हॉस्टल भवन का रंग पीला और सफेद है, जो राजयुग की स्थापत्य कला का नमूना है. लगता है यहां प्रवेश द्वार के पास बना रविदास मंदिर ज़्यादा पुराना नहीं है, क्योंकि इसकी टाइलें पुराने भवन से मेल नहीं खाती.

भीम सेना

युवाओं का झुंड है जो ख़ुद को भीम सेना कहता है. कुछ आस-पास के लोग कहते हैं कि रविदास हॉस्टल भीम सेना की बैठकों का अड्डा है, जहां बैठकर वे अपनी योजनाएं बनाते हैं. शब्बीरपुर गांव में 5 मई की घटना के बाद मंलवार को भड़की हिंसा ने क्षेत्र में व्याप्त जातिवाद को उजागर कर दिया. इसे क्षेत्र में जल्द ही होने वाले निकाय चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

शब्बीरपुर में दलित और ठाकुरों की संख्या बराबर ही है. महाराणा प्रताप जयंती पर जब राजपूत जुलूस निकाल रहे थे, तभी दलितों ने जुलूस पर पथराव कर दिया. इसके जवाब में राजपूतों ने शब्बीरपुर और महेशपुर गांव में कई दलितों के घर जला दिए.
दलितों के सशक्त संगठन भीम सेना का कहना है कि मंगलवार को हुई हिंसा प्रशासन द्वारा दलितों के साथ किए जा रहे भेदभावपूर्ण व्यवहार का नतीजा है. इस समूह के नेता चंद्रशेखर हैं, जो कि पेशे से वकील हैं. उनका दावा है कि उनके समूह के विभिन्न राज्यों में 40,000 से ज़्यादा सदस्य हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि यह आंकड़ा बढ़ा-चढ़ा कर बताया गया लगता है, क्योंकि ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं है कि यह समूह है भी!
इस बीच, रविदास हॉस्टल के युवा भीम सेना के बारे में बात करने से बचते दिखाई दिए. मंगलवार की घटना के बाद से इसके ज़्यादातर सदस्य ग़ायब हैं. इस संगठन के ख़िलाफ़ दो दर्जन से ज़्यादा आपराधिक मामले चल रहे हैं. एसएसपी एससी दुबे कहते हैं एटीएस,एसटीएफ सहित पुलिस की सारी इकाइयां और गुप्तचर शाखाएं मामले की तह तक जाने में लगी हैं. इस मामले में कुछ महत्वपूर्ण गिरफ्तारियां होने की संभावनाएं हैं.
करमचंद (दाहिने) जो सेकंड हैंड कार के व्यवसाय से जुड़े हैं. (सादिक नक़वी/कैच न्यूज़)

शब्बीरपुर की घटना

5 मई की घटना के पीछे एक ठोस वजह यह बताई जा रही है कि स्थानीय लोग गांव के प्रवेश द्वार पर अम्बेडकर की प्रतिमा लगाना चाहते थे, लेकिन राजपूतों ने इसका विरोध किया. अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के उपाध्यक्ष नाथी सिंह ने कहा, "प्रवेश स्थल पर तो दलितों के ही घर बने हुए हैं." सिंह ने कहा, राजपूतों ने इसका विरोध इसलिए किया, क्योंकि उन्हें गांव में प्रवेश करते ही इतनी बड़ी प्रतिमा सामने होना नहीं भा रहा था.
गत पंचायत चुनाव में कई राजपूत उम्मीदवारों के बीच एक दलित उम्मीदवार विजयी हुआ था. सिंह ने बताया कि दलित सरपंच ने स्थानीय पुलिस को चेतावनी दी थी कि अगर महाराणा प्रताप जयंती का जुलूस गांव के बीच से होकर गुजरेगा, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं. पुलिस ने उनकी बातों को तवज्जो नहीं दी और केवल दो ही कांस्टेबल तैनात किए. सरपंच को आशंका थी कि जुलूस पर हमला हो सकता है.
जिले के एक पुलिस अधिकारी ने कहा, "यह अब अभिमान की लड़ाई बन चुकी है." रामनगर के करमचंद का कहना है, "सम्मान का बदला सम्मान और अपमान का बदला अपमान." राजपूतों को यह रास नहीं आ रहा कि दलितों के पास भी अब पैसा आ गया है और वे राजनीतिक स्तर पर आवाज़ उठाने लगे हैं.
मंगलवार को हुई हिंसा में महाराणा प्रताप भवन की निर्माणाधीन दीवार को गिरा दिया गया. (सादिक नक़वी/कैच न्यूज़)

रामनगर ही क्यों?

रामनगर ही वह इलाक़ा है, जहां मंगलवार को हिंसा भड़की थी. कुछ दलितों की भीड़ उस वक्त आपे से बाहर हो गई जब उन्हें गांधी पार्क में ‘चमार पंचायत’ आयोजित करने से मना कर दिया गया. उग्र भीड़ ने निर्माणाधीन महाराणा प्रताप भवन की दीवारें भी गिरा दीं.
रामनगर के ही एक दलित खजान सिंह का कहना है कि "भीम सेना ने सोच-समझ कर रामनगर को निशाना बनाया, क्योंकि यहां गांव वालों पर दलितों का दबदबा है." सूनी पड़ी गलियों और बंद दुकानों की तरफ इशारा करते हुए सिंह ने कहा, "गांव के प्रवेश स्थलों पर जगह-जगह पुलिस तैनात है. ज्यादातर ग्रामीण पुलिस के डर से खेतों में या अन्य गांवों में जा छिपे."
इलाके के करमचंद कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ जो कि ख़ुद एक राजपूत हैं, के मुख्यमंत्री बनने के बाद राजपूत ज़्यादा उग्र हो गए हैं. उनको (राजपूतों को) लगता है कि वे उनके अपने हैं. इस बीच शब्बीरपुर मामले में पुलिस ने 10 राजपूतों को गिरफ़्तार किया है.

बसपा का हाथ?

सहारनपुर बसपा का गढ़ रहा है. केवल पिछले चुनाव ही ऐसे रहे, जहां बसपा को एक भी विधानसभा सीट न मिली हो. पुंडीर ने कहा कि यह हिंसा बसपा नेताओं के बीच उपजे तनाव का नतीजा है. वे दावा करते हैं कि वे युवाओं को भड़का रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि भीम सेना का संबंध भी बसपा से है. वे कहते हैं कि भीम सेना बसपा नेताओं की शह पर उछलने वाले गुंडों का एक समूह है, जिसमें एक पूर्व विधायक भी शामिल है.
वे कहते हैं बसपा को पिछड़ा वर्ग के वोट नहीं मिले, मुसलमानों के वोट नहीं मिले और सबसे महत्वपूर्ण दलितों के वोट तक नहीं मिले. उन्हें केवल जाट वोटों का ही सहारा रह गया है. बसपा खेतिहर मजदूरों और किसानों के बीच भी फूट डालना चाहती है, क्योंकि पार्टी के पास अपनी बची-खुची साख बचाने और भाजपा से मुकाबला करने का बस अब यही एक रास्ता रह गया है. वे कहते हैं भाजपा दलितों को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही. भाजपा, मोदी और योगी की यही कोशिश है कि वे दलितों को हिन्दू बना दें.
और भीम सेना? मोनू कुमार कहते हैं, "दलित राजनेता दलितों के लिए कुछ खास नहीं कर रहे थे. राजनेताओं की अपनी सीमाएं होती हैं. हमारे मुद्दों के लिए वे सड़कों पर नहीं उतर सकते." दरअसल वे यह स्पष्ट करना चाह रहे थे कि भीम सेना क्यों बनी? क्या भीम सेना बसपा की जगह ले सकती है? वे कहते हैं भीम सेना केवल एक सामाजिक संगठन है.
Source: http://hindi.catchnews.com/uttar-pradesh-news-in-hindi/saharanpur-violence-ground-report-we-were-hindus-only-till-polling-dalits-complain-60976.html
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राजस्थान के दलित छात्र ने IIT की मुख्य परीक्षा में देश-भर में टॉप किया!!

जहां एक तरफ देश में दलितों और आदिवासियों से छुआछूत और अत्याचार की खबरें आती रहती हैं वहीं इन सबके बीच राजस्थान के 17 साल के एक दलित छात्र कल्पित वीरवल ने आईआईटी की जेईई-मेन्स परीक्षा में 360 में 360 नंबर लाकर सबको चकित कर दिया। इस परीक्षा में फुल मार्क्स लाकर उन्होंने न सिर्फ जेईई-मेन्स की परीक्षा में दलित वर्ग में टॉप किया है बल्कि जनरल कटेगरी में भी टॉप कर सबको पीछे छोड़ दिया। इसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत का सहारा लिया और अपने भरोसे के दम पर यह सफलता हासिल की। आपको बता दें CBSE ने आज आईआईटी-जेईई की मेन्स परीक्षा का रिजल्ट घोषित किया है।



'हिंदुस्तान टाइम्स' से फोन पर बातचीत करते हुए कल्पित वीरवल ने बताया कि CBSE के अध्यक्ष आर के चतुर्वेदी ने सुबह फोन करके उन्हें इसकी खबर दी थी। वीरवल ने कहा कि जेईई-मेन्स में टॉप करना मेरे लिए खुशी की बात है लेकिन मैं अभी जेईई-एडवांस की परीक्षा के लिए फोकस करना चाहता हूं जो कि अगले महीने आयोजित होगी।

आपको बता दें कि वीरवल ने इसी साल MDS पब्लिक स्कूल से 12वीं की परीक्षा दी है जिसका रिजल्ट आना अभी बाकी है। कल्पित ने बताया कि उन्होंने रेगुलर क्लास करके और कभी भी क्लास मिस नहीं करके अपने आत्मविश्वास को ऊंचा बनाए रखा। वीरवल ने बताया कि कोचिंग और स्कूल की पढाई के अलावा वे रोजाना पांच से छ: घंटे की पढ़ाई करते हैं। 

कल्पित ने बताया कि उनकी इस सफलता के पीछे उनके मम्मी-पापा और उनके शिक्षकों का अहम योगदान है। उनके पिता पुष्कर लाल वीरवल उदयपुर के महाराणा भूपल राजकीय अस्पताल में कंपाउंडर हैं और उनकी मां सरकारी स्कूल में टीचर हैं। उनके बड़े भैया भी देश के सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले मेडिकल संस्थान एम्स से मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं।

कल्पित को क्रिकेट और बैंडमिंटन खेलना अच्छा लगता है और उन्हें संगीत का भी शौक है। उन्होंने बताया कि अभी फिलहाल उन्होंने अपना करियर प्लान नहीं बनाया है लेकिन वह आईआईटी मुंबई में कंप्यूटर साइंस में एडमिशन लेना चाहते हैं। कल्पित ने इससे पहले इंडियन जूनियर साइंस ओलंपियाड और नेशनल टेलेंट सर्च एग्‍जामिनेशन में भी टॉप किया है।

Source:http://www.nationaldastak.com/story/view/son-of-compounder-tops-in-jee-mains
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अम्बेडकरवाद का भक्तिकाल : दलित गुलामी के नए दौर का प्रारम्भ !

जयपुर में आज 13 अप्रैल 2917 को अम्बेडकर के नाम पर "भक्ति संध्या" होगी। दो केंद्रीय मंत्री इस अम्बेडकर विरोधी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होंगे। अम्बेडकर जैसा तर्कवादी और भक्तिभाव जैसी मूर्खता ! इससे ज्यादा बेहूदा क्या बात होगी ?



भीलवाड़ा में बाबा साहब की जीवन भर विरोधी रही कांग्रेस पार्टी का एस.सी. डिपार्टमेंट दूसरी मूर्खता करेगा। 126 किलो दूध से बाबा साहब की प्रतिमा का अभिषेक किया जायेगा। अभिषेक होगा तो पंडित भी आएंगे ,मंत्रोच्चार होगा,गाय के गोबर ,दूध ,दही ,मूत्र आदि का पंचामृत भी अभिषेक में काम में लिया ही जायेगा । अछूत अम्बेडकर कल भीलवाड़ा में पवित्र हो जायेंगे!

तीसरी वाहियात हरकत रायपुर में होगी 5100 कलश की यात्रा निकाली जाएगी। जिस औरत को अधिकार दिलाने के लिए बाबा साहब ने मंत्री पद खोया ,उस औरत के सर पर कलश,घर घर से एक एक नारियल लाया जाएगा। कलश का पानी और नारियल आंबेडकर की प्रतिमा पर चढ़ाये जायेंगे। हेलिकॉप्टर से फूल बरसाए जायेंगे। जिस अम्बेडकर के समाज को आज भी नरेगा ,आंगनवाड़ी और मिड डे मील का मटका छूने की आज़ादी नहीं है ,उनके नाम पर कलश यात्रा ! बेहद दुखद ! निंदनीय !



एक और जगह से बाबा साहब की जयंती की पूर्व संध्या पर भजन सत्संग किये जाने की खबर आयी है। एक शहर में लड्डुओं का भोग भगवान आंबेडकर को लगाया जायेगा।

बाबा साहब के अनुयायी जातियों के महाकुम्भ कर रहे है ,सामुहिक भोज कर रहे है,जिनके कार्डों पर गणेशाय नमः और जय भीम साथ साथ शोभायमान है।भक्तिकालीन अम्बेडकरवादियों के ललाट पर उन्नत किस्म के तिलक आप हरेक जगह देख सकते है। जय भीम के साथ जय श्री राम बोलने वाले मौसमी मेढकों की तो बहार ही आयी हुयी है।



बड़े बड़े अम्बेडकरवादी हाथों में तरह तरह की अंगूठियां फसाये हुए है,गले में पितर भैरू देवत भोमियाजी लटके पड़े है और हाथ कलवों के जलवों से गुलज़ार है,फिर भी ये सब अम्बेडकरवादी है।

राजस्थान में बाबा साहब की मूर्तियां दलित विरोधी बाबा रामदेव से चंदा ले के कर डोनेट की जा रही है।इन मूर्तियों को देख़ कर ही उबकाई आती है। कहीं डॉ आंबेडकर को किसी मारवाड़ी लाला की शक्ल दे दी गयी है ,कहीं हाथ नीचे लटका हुआ है तो कहीं अंगुली "सबका मालिक एक है " की भाव भंगिमा लिए हुए है।

 ये बाबा साहब है या साई बाबा ? मत लगाओ मूर्ति अगर पैसा नहीं है या समझ नही है तो।

 कहीं कहीं तो जमीन हड़पने के लिए सबसे गन्दी जगह पर बाबा साहब की घटिया सी मूर्ति रातों रात लगा दी जा रही है।

बाबा साहब की मूर्तियां बन रही है ,लग रही है ,जल्दी ही मंदिर बन जायेंगे ,पूजा होगी ,घंटे घड़ियाल बजेंगे,भक्तिभाव से अम्बेडकर के भजन गाये जायेंगे। भीम चालीसा रच दी गयी है,जपते रहियेगा।



गुलामी का नया दौर शुरू हो चुका है। जिन जिन चीजों के बाबा साहब सख्त खिलाफ थे ,वो सारे पाखण्ड किये जा रहे। बाबा साहब को अवतार कहा जा रहा है। भगवान बताया जा रहा है। यहाँ तक कि उन्हें ब्रह्मा विष्णु महेश कहा जा रहा है। 

हम सब जानते है कि डॉ अम्बेडकर गौरी ,गणपति ,राम कृष्ण ,ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश ,भय ,भाग्य ,भगवान् तथा आत्मा व परमात्मा जैसी चीजों के सख्त खिलाफ थे।
वे व्यक्ति पूजा और भक्ति भाव के विरोधी थे। उन्होने इन कथित महात्माओं का भी विरोध किया ,उन्होंने कहा इन महात्माओं ने अछूतों की धूल ही उड़ाई है।

पर आज हम क्या कर रहे है बाबा साहब के नाम पर ? जो कर रहे है वह बेहद शर्मनाक है ,इससे डॉ अम्बेडकर और हमारे महापुरुषों एवम महस्त्रियों का कारवां हजार साल पीछे चला जायेगा। इसे रोकिये। 

बाबा साहब का केवल गुणगान और मूर्तिपूजा मत कीजिये। उनके विचारों को दरकिनार करके उन्हें भगवान मत बनाइये । बाबा साहब की हत्या मत कीजिये। 

आप गुलाम रहना चाहते है ,बेशक रहिये ,भारत का संविधान आपको यह आज़ादी देता है ,पर डॉ अम्बेडकर को प्रदूषित मत कीजिये।

आपका रास्ता लोकतंत्र और संविधान को खा जायेगा। फिर भेदभाव हो ,जूते पड़े,आपकी महिलाएं बेइज्जत की जाये और आरक्षण खत्म हो जाये तो किसी को दोष मत दीजिये।

 इन बेहूदा मूर्तियों और अपने वाहियात अम्बेडकरवाद के समक्ष सर फोड़ते रहिये।रोते रहिये और हज़ारो साल की गुलामी के रास्ते पर जाने के लिए अपनी नस्लों को धकेल दीजिये।गुलामों से इसके अलावा कोई और अपेक्षा भी तो नहीं की जा सकती है।

 जो बाबा साहब के सच्चे मिशनरी साथी है और  इस साजिश और संभावित खतरे को समझते है ,वो बाबा साहब के दैवीकरण और ब्राह्मणीकरण का पुरजोर विरोध करे।मनुवाद के इस स्वरुप का खुल कर विरोध करे। 

अम्बेडकरवाद में भक्तिभाव  के लिए कोई जगह नहीं है ।

- भंवर मेघवंशी 
( स्वतंत्र पत्रकार एवम सामाजिक कार्यकर्ता )
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ख़ामोशी तोड़ो दलितों, आदिवासी बच्चियों के बलात्कार और हत्या पर पसरी यह चुप्पी भयानक है

आखिर राजस्थान में दो दलित छात्राओं से बलात्कार व आत्महत्या की नृसंश घटना पर इस देश में कोई मोमबत्ती क्यों नहीं जली?

राजस्थान के सीकर जिले के नीम का थाना क्षेत्र के भगेगा गाँव के एक दलित बलाई परिवार की प्रथम वर्ष में पढ़ने वाली दो सगी बहनों के साथ तीन सवर्ण युवाओं ने घर में घुस कर सामुहिक बलात्कार किया।

बलात्कारी पीड़िताओं के भाई के आ जाने के बाद भाग छूटे। 17 व 18 साल की इन दोनों दलित छात्राओं ने बलात्कार के बाद ट्रेन के आगे कूद कर जान दे दी।

ये दर्दनाक और शर्मनाक घटना 5 अप्रैल 2017 को दिन में घटी। 8 घंटे प्रयास करने के बाद नामजद मुकदमा दर्ज किया गया। मामला बलात्कार, दलित अत्याचार,नाबालिग के लैंगिक शोषण का होने के बावजूद भी जानबूझकर सिर्फ आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण की धारा 306 में मामला दर्ज किया गया। इलाके के सरपंच, विधायक और पुलिस उप अधीक्षक सब आरोपियों की जाति के है। पूरे मामले को शुरू से बिगाड़ा जा रहा है।

राजस्थान में सक्रिय विभिन्न जाति संगठन ,समाज की महासभाएं, सामाजिक संगठन ,महिला संगठन ,दलों के गुलाम प्रकोष्ठ व मोर्चे तथा दलित संगठनों को भी कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। सब  अपने अपने गोरखधंधे में व्यस्त है। एक आध को छोड़ कर कोई भी इस गरीब पीड़ित दलित परिवार से मिलने तक नहीं पंहुचा।

सवाल उठता है कि महिलाओं के साथ यौनिक बर्बरता के खिलाफ जनपथ तथा जंतर मंतर पर सड़कों पर उतरने वाले साथी ,उछल उछल कर नारे लगाने वाले क्रन्तिकारी, मोमबत्तियां जलाने वाले संवेदनशील भारतीयों की संवेदना बलात्कार पीड़ित दलित आदिवासी महिलाओं के लिए संवेदन शून्यता से क्यों भर जाती है?

मुझे मालूम है कि आप सब लोग बाबा साहब की 126वी जयंती के समारोह को सफल बनाने में सलंग्न होंगे, मगर इस बार के आयोजन में अगर हम भगेगा की इन दलित बहनों के साथ हुए अमानवीय अत्याचार अन्याय के खिलाफ नहीं बोलेंगे तो फिर कब बोलेंगे?

14 अप्रैल को हर जगह इस क्रूर कांड की कड़ी भर्त्सना कीजिये, पीड़ितों के लिए न्याय मांगिये,दलित आदिवासी एवम अन्य वंचित तबके की पीड़ित स्त्रियों के लिए आवाज़ उठाइये। अगर हम ही नहीं बोलेंगे तो हमारे लिए कौन बोलेगा। कोशिश कीजिये भगेगा जाने की, पीड़ित परिवार को संबल देने की ,उनके संघर्ष में सहायक होने की।
मानव अधिकार कार्यकर्ता कैलाश मीणा का आभार, जिन्होंने इस बारे में जानकारी दी और पीड़ित परिवार से मिलवाया। आप भी इस बारे में साथी Kailash Mina से सीधे इस नम्बर  09928136988 बात कर सकते है।
इंतज़ार मत कीजिये, न्याय की लड़ाई के लिए आगे आना ही अम्बेडकर के कारवां को आगे बढ़ाना है। अगर हम भगेगा के लालचंद वर्मा के परिवार को न्याय दिला पाये तो यह अम्बेडकर जयंती मनाना सार्थक हो जायेगा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

संपादन- भवेंद्र प्रकाश
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Dalit Groom Allegedly Beaten Up By Upper Caste Men For Riding A Horse



Upper caste men from the Rajput community in Haryana allegedly pushed a Dalit groom from his horse and beat him up for performing the ghurchari ceremony.


The incident played out on Tuesday night when Sanjay along with his family members and the rest of the baraat were making their way to the bride's house in the Sanjarwas village of Charkhi Dadri district, The Hindustan Times reported today. The upper caste men reportedly told Sanjay that Dalits were not allowed to perform ghurchari following which a scuffle ensued. Three of bride's family members, who tried to intervene, were also brutally beaten up and later hospitalized.


The police have reportedly lodged a case under relevant sections of the Indian Penal Code and the SC and the ST (Prevention of Atrocities) Act. While one person has been apprehended, the police are still looking for others who were involved in the assault.


Dalit grooms are often beaten up for riding horses. Last year, a Dalit groom in Madhya Pradesh rode to his pre-wedding ceremony under heavy police protection after upper caste men allegedly warned him against mounting a horse. Another Dalit groom in Madhya Pradesh had to wear a helmet while riding a horse as upper caste people in the village threw stones at him.
Source: http://www.huffingtonpost.in/2017/04/06/dalit-groom-allegedly-beaten-up-by-upper-caste-men-for-riding-a_a_22028638/?utm_hp_ref=in-homepage&ncid=fcbklnkinhpmg00000001
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