Beingदलित

गुजरात दंगों में न तो हिंदू को इंसाफ मिला न मुसलमान को बल्कि दंगा करवाने वाले दिल्ली पहुंच गए- जिगनेश मेवानी



27 फरवरी को गोधराकांड के 15 साल पूरे हो जाएंगे। गोधराकांड के बाद गुजरात में जो दंगे हुए उसको देश अभी तक भुला नहीं पाया है। गुजरात ने दंगों के दौरान जो कुछ सहा है वह दोबारा ना हो उसके लिए गुजरात के साथ-साथ पूरे देश के अमनपसंद लोग इसकी कोशिश में रहते हैं।


गुजरात के युवा क्रांतिकारी नेता जिग्नेश मेवानी ने गुजरात और देश की आम जनता से अपील की है कि, वह देश के संविधान पर विश्वास करें और धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं से दूर रहें।
जिग्नेश ने फेसबुक पर एक वीडियो अपलोड कर कहा है कि, गोधरा कांड में जो हिंदू भाई-बहनों की मौत हुई न तो उनको इंसाफ मिला और न ही उसके बाद हुए दंगों में जिन मुसलमान भाई-बहनों की मौत हुई उनको इंसाफ मिला। साथ ही जिग्नेश ने कहा कि जिन लोगों ने दंगों पर राजनीति की वह राज्य से देश की राजनीति में पहुंच गए।


जिग्नेश ने कहा कि, जिन लोगों ने दंगों में अपने लोगों को खोया उनकी हालत आज भी बहुत खराब है। दंगों के बाद मुसलमान जिन बस्तों में रह रहे हैं वहां की हालत बहुत खराब है। न साफ पीने का पानी है, ना ही उनके बच्चों के लिए सही पढ़ाई का कोई इंतजाम है और ना वहां पर अस्पताल है।
जिग्नेश ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि हमें अपने देश के संविधान पर विश्वास रख उसके अनुसार चलना चाहिए। जो हमें सेक्यूलर और समाजवाद की राह दिखाता है। जहां धर्म की राजनीति करने वालों की कोई जगह नहीं है।
Source: http://boltahindustan.com/jignesh-mevani-said-beware-from-communal-politicians/
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गुजरात में गाय दलित घोषित तो राजस्थान में सुन रहीं हैं भागवत कथा!!



देश में इन दिनों गधों की जमकर तारीफ हो रही हैं और उनकी शान में क्या खूब कसीदे पढ़े जा रहे हैं. स्वयं प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि गधे उनके लिए प्रेरणा-स्रोत रहे हैं और वे गधे की तरह दिन भर काम करते हैं.
लेकिन इन दिनों भाजपा शासित राज्यों में गायों की दयनीय हालत के कई ऐसे किस्से सामने आ रहे हैं, जिन पर सोशल मीडिया में जमकर चटखारे लिए जा रहे हैं. गुजरात के मेहसाणा जिले में दलित समुदाय की गायों को दलित घोषित कर दिया गया है तो राजस्थान के सीकर जिले में 211 गायों को 211 ब्राह्मण भागवत कथा सुना रहे हैं.



आप मानें या न मानें, लेकिन राजस्थान के शेखावाटी इलाके के सीकर जिले के फतेहपुर में बुधगिरि मढ़ी पर चल रही श्रीमद् भागवत कथा को स्थानीय मीडिया बहुत अद्भुत बता रहा है. भागवत कथा के लिए एक व्यास पीठ बनाई गई है और इस व्यास पीठ के पीछे 211 गायों के बैठने की विशेष जगह बनाई गई है. एक-एक गाय को एक-एक ब्राह्मण भागवत कथा सुना रहा है. हर गाय को भागवत के सभी 18000 श्लोक सुनाए जाएंगे. आयोजकों ने बाकायदा यह व्यवस्था की है कि हर गाय को हर पंडित हर रोज आठ घंटे भागवत सुनाए.
महंत दिनेश गिरि के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार सनातन धर्म का मूल आधार गाय ही है. गाय में सभी 33 करोड़ देवी-देवताओं का निवास है। चारों वेद और 108 उपनिषद भी गायों में ही निहित हैं। गिरि के अनुसार शास्त्रों में कहा गया है कि कलियुग में गौ, गंगा और भागवत ही मानव की मुक्ति और मोक्ष का आधार हैं, इसलिए गायों के लिए यह विशेष अनुष्ठान किया जा रहा है. इस अनुष्ठान में हर दिन श्रद्धालु आते हैं और भागवत कथा सुनकर पवित्र होने वाली गौओं और कथावाचक ब्राह्मणों से आशीर्वाद लेते हैं.


राजस्थान सरकार के पंचायती राज और ग्रामीण विकास तथा संसदीय मामलों के मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ सहित कई बड़े नेता इस गो महिमा महोत्सव में आ चुके हैं और आए दिन लोग आ रहे हैं. यह भी कहा जा रहा है कि यह जगह बहुत अद्भुत है और यहां लोकदेवता बुधगिरि जी महाराज ने 21 साल पहले जीवित समाधि ली थी. वे बड़े गोरक्षक थे. यह क्षेत्र उसी सीकर जिले का हिस्सा है, जिसमें 1987 में दिवराला सती कांड हुआ था. हालांकि आज यह इलाका पूरे राजस्थान में सबसे अधिक साक्षरता वाले इलाकों में अपनी पहचान स्थापित कर चुका है.
मैंने लोगों से पूछा कि गाएं भागवत कथा सुनती हैं तो वे कब चारा चरती हैं और कब जुगाली करने के बाद आराम फरमाती हैं? उनका जवाब था कि गायों को सुबह आठ से बारह बजे तक भागवत कथा सुनाई जाती है. इस बीच ब्राह्मण देवता भोजन करने चले जाते हैं और गौमाता आराम करती हैं. इसके बाद दो बजे से छह बजे तक फिर गायों को फिर कथा श्रवण करवाई जाती है. लोगों ने बताया कि इस विशेष भागवत कथा के लिए जगदगुरु मलूकपीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्र दास देवाचार्य प्रतिदिन साढ़े बारह बजे से दोपहर साढ़े तीन बजे तक मुख्य कथा सुनाते हैं. इसका लाभ गौमाता के अलावा आम भक्त भी उठाते हैं.


राजस्थान के सीकर में भले गौमाताओं को भागवत कथा सुनाई जा रही हो, लेकिन गुजरात के मेहसाणा जिले की यह कहानी एक और ही भेदभाव की दास्तान बताती है. गुजरात में पिछले दिनों गौरक्षकों ने जिस तरह मृत गायों को उठाने वाले दलितों पर जानलेवा हमले किए और जिन पर स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत तीखी भाषा में आलोचना की, वहां यह किस्सा सुनकर न हंसते बनता है और न रोते. गुजरात के कई प्रशासनिक अधिकारी इस पर हैरान हैं और उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि इस तरह की चीजों से कैसे पार पाएं.
यह किस्सा है मेहसाना जिले के नदोली ग्राम पंचायत का. स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यहां सवर्ण लोगों ने पांच दलित परिवारों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया. लेकिन दलित जब अपनी गायों के लिए चारा लाने गए तो कहा गया कि दलितों की गाएं भी दलित हैं और दलित गाय के लिए चारा भी नहीं मिल सकता. दलित गाएं सवर्ण लोगों के सवर्ण खेतों का चारा कैसे खा सकती हैं. इन लोगों ने मेहसाणा के जिला कलेक्टर से गुहार लगाई, लेकिन समस्या का कोई हल नहीं निकला और गायों के सामने भी भूखों मरने की नौबत आ गई.
मेहसाणा के जिला कलेक्टर को दिए गए वेदना पत्र में इन लोगों ने स्पष्ट कहा है कि गायों के लिए चारा और पानी लाने के लिए उन्हें दूसरे गांवों में जाना पड़ता है. यह विचित्र किस्म का मामला जेरालु ताल्लुका के गांव का बताया जा रहा है. गुजरात के कई अन्य इलाकों में भी इस तरह की घटनाएं हुई हैं. दलित अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले लाेगों का कहना है कि गुजरात एक नई कट्टरता के दौर से गुजर रहा है और हालात वाकई में बहुत विचित्र किस्म के हो रहे हैं. पीड़ितों ने प्रशासनिक अधिकारियों को जानकारी दी है कि गायों के बछड़ों तक के लिए पानी और चारा रोक दिया गया है.
चलिए जब गायों के दलित होने का किस्सा सुना है तो अब आप जरा गायों के बारे में यह भी जानकारी लेते चलिए कि गायों के मूत्र, गोबर, दूध, घी और दही के पंचगव्य पर अब दिल्ली आईआईटी को शोध करने के लिए कहा गया है. राजस्थान सरकार ने तीन साल पहले गोरक्षा विभाग खोलकर सभी संबंधित शोध केंद्रों पर कहा था कि वे पंचगव्य पर शोध करें. इतना ही नहीं, संभवत: इन्हीं शोधों के आधार पर पिछले दिनों राजस्थान के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने कहा था कि विश्व में एक भारतीय गाय ही ऐसा प्राणी है जो सांस के रूप में ऑक्सीजन छोड़ती है!
Source: http://hindi.firstpost.com/india/cows-in-rajasthan-being-taught-bhagwat-katha-in-gujarat-branded-dalit-doneky-remark-15525.html
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JNU का दिलीप यादव अकेला दलित-आदिवासी की लड़ाई लड़ रहा है,हमसब को आगे आना चाहिए: रवीश कुमार



दिलीप यादव जेएनयू में कई दिनों से भूख हड़ताल पर बैठा है। कई दिनों से भूख हड़ताल के कारण उसे अस्पताल में भर्ती न कराया गया होता तो शायद ही किसी की नज़र जाती। दिलीप यादव जिस मुद्दे के लिए अपनी जान से खेल रहा है, कायदे से वे हिन्दी भाषी समाज के मुद्दे होने चाहिए थे। हिन्दी अख़बारों के ज़िला संस्करणों में इसे छा जाना चाहिए था। हिन्दी के दर्शकों के बीच पता नहीं क्या क्या दिखाकर छा जाने वाले तमाम चोटी के चैनलों को भी इसे अपना सवाल बनाना चाहिए था।


कोई इन चोटी के चैनलों के संपादकों से भी नहीं पूछता। क्या पता पूछने पर सकारात्मक जवाब भी जाए। हिन्दी के अख़बार हो या चैनल, उनके लिए हिन्दी का बाज़ार तो है मगर हिन्दी का सवाल कभी सवाल नहीं होता है। हिन्दी के प्रति न तो भाषाई प्रतिबद्धता होती है न ही हिन्दी के अवसरों के प्रति। यही हाल हिन्दी भाषी सांसदों और विधायकों का है। यूपीएससी में हिन्दी माध्यम के छात्रों का मामला गरमाया था, जब तक विरोध करने वाले छात्र लाठी न खा लिये, पानी की बौछारों से भीगा नहीं दिये गए, किसी का ध्यान नहीं गया।


तमाम तरह की शून्यताओं और अवहेलनाओं के बीच दिलीप यादव हिन्दी या भारतीय भाषाओं के छात्रों को लेकर भूख हड़ताल पर बैठा है। जितना समझ आया है, उसके अनुसार पहले एमफिल और पीचडी में सत्तर अंक की लिखित परीक्षा पास करने के बाद तीस अंकों का वायवा यानी मौखिक साक्षात्कार देना होता था। पुरानी कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि अक्सर इस तीस अंक में भी हकमारी हो जाती थी।

दलित और कमज़ोर तबके के ग़ैर अंग्रेज़ी छात्रों को कम नंबर मिलते थे। इसलिए इंटरव्यू तीस की जगह पंद्रह अंकों का होना चाहिए। ये तो नहीं हुआ लेकिन जेएनयू ने यूजीसी के इस आदेश को मान लिया कि लिखित परीक्षा सिर्फ क्वालिफाई करने के लिए होगी। इंटरव्यू के ही सारे अंक तय करेंगे कि आप एडमिशन के लायक हैं या नहीं। जब एडमिशन इंटरव्यू के सौ नंबर से ही तय होंगे तो लिखित परीक्षा भी बंद कर दीजिए। दिलीप यादव और अन्य छात्रों का कहना है कि इससे सुदूर ज़िलों,कस्बों के साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को मौका नहीं मिलेगा।


छात्रों को अंदेशा है कि सौ नंबर के इंटरव्यू के कारण कोई उनकी राजनीति या तार्किक सोच के कारण भी बाहर कर सकता है। भारत जैसे देश में जहां संस्थाएं सवाल न पूछने को प्रोत्साहित करती हैं वहां कोई बाग़ी तेवर का छात्र आ जाए तो उसकी किस्मत अधर में लटक सकती है। सामाजिक तौर से हम लोग संस्थाओं में रहते हुए और संस्थाओं से बाहर रहते हुए बेहद दब्बू किस्म के होने लगे हैं। हम बाहर भीतर से इसे खोखला करते चलते हैं। कायदे से यूजीसी को जेएनयू की पुरानी कमेटी के आधार पर दूसरे विश्वविद्यालयों को भी नोटिस भेजना चाहिए था कि कहीं उनके यहां भी तो इंटरव्यू में भेदभाव नहीं होता है। अंग्रेजी के कारण मराठी, बांग्ला, तमिल, उड़िया और हिन्दी के छात्रों के साथ भेदभाव होता है। हर जगह भारतीय भाषाओं के छात्र कम संभावनाओं के बीच अधिक संभावनाएं पैदा करने में मर खप जा रहे हैं।

अब सवाल ये है कि ये सवाल क्या सिर्फ दिलीप यादव का है। क्या ये सवाल बिहार का नहीं है, यूपी का नहीं है, बंगाल का नहीं है, उड़ीसा का नहीं है। बाकी विश्वविद्यालय के छात्रों को संविधान निर्माताओं ने मना किया है कि तुम चुपचाप पढ़ाई करके दहेज लेने की तैयारी करना,अपनी ही तरह की दहेज देने वाली मूर्खा से शादी करना, डीजे बुलाकर डांस करना क्योंकि प्रदर्शन करना होगा तो जेएनयू वाला करेगा वर्ना प्रदर्शन नहीं माना जाएगा और प्रदर्शन होगा तो ये कहना कि जेएनयू वाले पढ़ते कब हैं, दिन भर प्रदर्शन ही करते हैं क्या।

भाई मेरे, पढ़ते हैं तभी तो प्रदर्शन करते हैं न। आप जब नोटिफिकेशन नहीं पढ़ेंगे, फीस का ढांचा नहीं देखेंगे, सस्ती शिक्षा के अपने अधिकार को लेकर पढ़ाई नहीं करेंगे तो प्रदर्शन कहां से करेंगे। अरे भाई विरोध ही ज़रूरी नहीं है, किसी फैसले का समर्यथन भी तो किया जा सकता है। वहीं दिलीप यादव के सामने समर्थन में प्रदर्शन करो। कहो कि हममें से जिनकी अंग्रेज़ी ठीक नहीं है, जो अपनी भाषा में बोलने में ठीक नहीं हैं, घबरा जाते हैं, लिखते हैं तो ही बेहतर रहते हैं मगर हमारे जैसे छात्रों को एडमिशन में चांस कम हो,इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। हम सभी अपनी संभावनाओं के ख़त्म होने का समर्थन करते हैं। हम पहले भी ख़त्म थे, अब भी ख़त्म रहने का प्रण करते हैं।समर्थन में भी तो प्रदर्शन हो सकता है। वो भी क्यों नहीं होता है।

जेएनयू की एक ख़ूबी है। यहां दूर दराज़ से आने वाले अपनी अपनी भाषाओं के प्रतिभाशाली छात्रों को मौका मिलता है। अब अगर इंटरव्यू के आधार पर ही एमफिल और पीएचडी में एडमिशन होंगे तो ऐसे छात्रों को कहां से मौका मिलेगा। यही छात्र आगे चलकर पढ़ाई लिखाई से लेकर प्रशासन तक में अच्छा करते हैं। इनमें से ज्यादातर दूर दराज़ के कस्बों से आए होते हैं। महानगरों के छात्रों में भी साधारण पृष्ठभूमि के छात्र होते हैं। अस्सी के दशक में भी इस तरह की छेड़छाड़ हुई थी। नए फैसले को लेकर बहस होनी चाहिए कि आपके हित में कितना है, आपके ख़िलाफ़ कितना है।


एक बात याद रखनी चाहिए। हिन्दी का छात्र हिन्दी का छात्र होता है। वो हर जगह पाने के लिए पाने से ज़्यादा खोता चलता है। उसकी कोई भी उपलब्धि खोए हुए की लंबी सूची के बग़ैर नहीं होती है। ख़ुद हिन्दी माध्यम का छात्र रहा हूं और इसी भाषा का पत्रकार तो हर पल एक खाई लांघनी पड़ती है। आप प्राप्ति के शिखर पर भी वंचित की तरह खड़े होते हैं। यह अनुभव हिन्दी का ही नहीं है। बांग्ला, तमिल, उड़िया और मराठी छात्रों का भी है। फिर भी अंग्रेज़ी के वर्चस्व के ख़िलाफ़ भारतीय भाषाएं कभी एकजुट नहीं हो पाती हैं। उनकी ट्रेनिंग आपस में बंटने की है, एकजुट होकर लड़ने की नहीं है।

इसीलिए दिलीप यादव अकेला है। जेएनयू के छात्र साथ दे रहे हैं मगर हिन्दी या भारतीय भाषाओं का समाज चुप है। हिन्दी का नाम लेने वाली सरकारें भी उसी संदर्भ में लेती हैं जब इसके सहारे दूसरी भाषाओं से टकराव की संभावना हो। दूसरी भारतीय भाषाओं पर दबदबा बनाए रखने या धमकाने के लिए हिन्दी का इस्तमाल कर लिया जाएगा मगर जहां हिन्दी के मूल सवाल होंगे वहां हर कोई चुप रहेगा। दिलीप यादव को अपनी सेहत का ख़्याल रखना चाहिए। अकेले की लड़ाई तकलीफदेह होती है।
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RSS प्रवक्ता मनमोहन वैद्य का बड़ा बयान, आरक्षण खत्म होना चाहिए!!



पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले आरएसएस विचारक और अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य का एक बड़ा बयान आया है। उन्होंने कहा कि आरक्षण खत्म होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर सभी को समान अवसर चाहिए तो शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों से आरक्षण खत्म होना चाहिए। 
वो जयपुर साहित्य महोत्सव में बोल रहे थे। गौरतलब है कि बिहार चुनाव से पहले भी आरएसएस ने आरक्षण खत्म करने का बड़ा बयान दिया था। बिहार में बीजेपी के हारने का एक कारण आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण खत्म करने संबंधी बयान को भी माना गया।



इसके बाद मामले को संभालते हुए दत्तात्रेय हंसबोले ने कहा कि उनके कहने का ये मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि जाति विशेष का आरक्षण खत्म किया जाए। वैद्य ने सभी को समान अवसर मिलने की बात बोला है। जाति आधारित आरक्षण जारी रहना चाहिए।


Reference:
http://www.india.com/hindi-news/india-hindi/reservation-must-abolished-says-manmohan-vaidya-rss-idiolog/
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मध्यप्रदेश में दलित महिला जज को गवाह ने दीं जाति सूचक गालियां



जब कोई जज किसी केस पर अपनी फैसला सुनाता है तो सब उस फैसले का पालन करते है लेकिन मध्यप्रदेश के राजगढ़ की जिला कोर्ट में बोर्ड पर बैठे जज को जाति सूचक शब्द कहने का मामला सामने आया है। वहीं इस मामले में राजगढ़ की जिला कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और आरोपी को पांच वर्ष की सजा सुनाकर जेल भेज दिया। 

आपको बता दें कि अजा-जजा एक्ट में प्राय: तीन माह से छह माह और अधिकाधिक एक वर्ष की सजा होती रही है। देश में संभवत: पहली बार ऐसे मामले में पांच वर्ष की सजा सुनाई गई है।


27 अप्रैल 2015 को राजगढ़ जिले की नरसिंहगढ़ कोर्ट में घटी। अतिरिक्त व्यवहार न्यायाधीश पदमा जाटव एक मामले की सुनवाई कर रही थी तब गवाह ने उन्हें जाति सूचक शब्द कहते हुए दुर्व्यवहार किया था। जब जज पदमा जाटव के कोर्ट में एक मामले में आरोपी महेंद्र जाट गवाही देने आया था। तो वकील ने उसे कहा कि आज मुलजिम नहीं आए हैं इसलिए वह उसकी गवाही नहीं ले पाएगा।

इस पर जज पदमा ने गवाह से कहा था कि वह अगली सुनवाई पर आ जाए। इस पर आरोपी गवाह ने जज जाटव को उनकी जाति का नाम लेकर भरी अदालत में अपमानित किया था। मामले में जज की शिकायत पर वहां की पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आदिम जाति जन जाति अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज कर गिरफ्तार कर विशेष न्यायाधीश राजेशकुमार गुप्ता की कोर्ट में चालान पेश किया था।

कोर्ट ने इस मामले को लेकर कड़ी टिप्पणी की कि बोर्ड पर बैठकर न्यायिक कार्य का निर्वहन करते समय यह कृत्य न केवल गंभीर अपराध है बल्कि दुर्भाग्यपूर्ण है। यह फैसला राजगढ़ जिला कोर्ट में विशेष न्यायाधीश (अजा-जजा) राजेशकुमार गुप्ता ने सुनाते हुए तल्ख टिप्पणी की कि कोर्ट द्वारा जब भी किसी भी व्यक्ति के खिलाफ मनमाफिक फैसला नहीं सुनाने पर वह जज के साथ दुर्व्यवहार पर आमादा हो जाता है। साथ ही कहा कि कोर्ट के प्रति बढ़ती हुई असहिष्णुता चिंता जनक है। इसी कारण आरोपी महेंद्र जाट को सख्त से सख्त सजा दी जाना आवश्यक है।

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सदियों पुराने मंदिर ने दलितों के लिए खोले दरवाजे


सदियों से जिस मंदिर के दरवाजे सवर्णों के अलावा किसी और के लिए नहीं खुलते थे, उसने अब बिना किसी भेदभाव के सबके लिए अपने द्वार खोल देने का फैसला किया है। हरिहरपक्कम गांव और उसके पड़ोस में बसे नम्मांडी गांव की आपसी लड़ाई का नतीजा इतना बेहतर होगा, ऐसा किसी ने भी नहीं सोचा था। हरिहरपक्कम गांव में सवर्णों की आबादी है। पड़ोस के गांव नम्मांडी में एक दलित बस्ती के लोगों के साथ उनका विवाद था। दलितों की मांग थी कि उन्हें भी मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी जाए। आखिरकार अब सबकी आपसी सहमति से इस मंदिर को हर किसी के लिए खोल दिया गया है। अब यहां किसी भी जाति तो क्या, किसी भी धर्म और संप्रदाय के लोग भी दर्शन के लिए आ सकते हैं।




अरुलमिगु थुलुकांतामन मंदिर सदियों पुराना है। दो महीने पहले यहां ताला लग गया था। वन्नियर समुदाय और दलितों के बीच मंदिर में प्रवेश के मुद्दे पर शुरू हुआ विवाद काफी आगे बढ़ गया था। गांव के बड़े-बुजुर्गों ने बुधवार को ग्राम सभा की एक विशेष बैठक बुलाने का फैसला किया। इस बैठक में तय किया गया कि मंदिर के दरवाजे अब सभी के लिए खुले रहेंगे। इसी गांव में रहने वाले एक बुजुर्ग बाबू ने बताया, 'हम कहने जा रहे हैं कि किसी भी जाति या संप्रदाय के लोग पूजा और प्रार्थना के लिए मंदिर में आ सकते हैं। हम बुधवार से यह प्रस्ताव लागू कर देंगे।'

बाबू के साथ गांव के कुछ अन्य वरिष्ठ ग्रामीण चेय्यार के सबकलेक्टर टी प्रभु शंकर से मंगलवार को मिले और उन्होंने मंदिर को फिर से खोलने की अपील की। ग्रामीणों की ओर से उन्हें एक लिखित समझौते की प्रति भी दी गई। इस मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित था। इस परंपरा का टूटना एक ऐतिहासिक घटनाक्रम होगा। तमिलनाडु में कई ऐसे मंदिर हैं जहां दलितों का प्रवेश प्रतिबंधित है। इस मंदिर में दलितों को प्रवेश की अनुमति मिलने के बाद बाकी मंदिरों के भी इस नई परंपरा को अपनाने की संभावना रही है। बाबू बताते हैं कि जब से यह मंदिर बना है, तभी से ही इसमें दलितों के प्रवेश पर मनाही है।
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'मनु' मानवता के माथे का 'कलंक' है,इसलिये उसे मिटाना होगा

तकरीबन छब्बीस साल पहले न्याय के मंदिर कहे जाने हाईकोर्ट परिसर में राजस्थान उच्च न्यायालय न्यायिक सेवा संगठन और लॉयन्स क्लब जयपुर केपिटल के सहयोग से मानवता के माथे पर इस कलंक को स्थापित किया गया.हाईकोर्ट के बिल्डिंग प्लान में विषमता की विषाक्त व्यवस्था के जनक मनु की मूर्ति लगाने का कोई प्रस्ताव नहीं था.



पर प्लान में मनु हो या ना हो भारतीय सनातनी समाज के मनों में मनु बहुत गहरे विद्यमान रहा है,इसलिये जाति और वर्ण की उंच नीच  भरी व्यवस्था को शास्त्रोक्त बनाने वाला मनु कभी महर्षि कहा जाता है तो कभी भगवान मनु के रूप में प्रतिष्ठा पाता है.


पूरे देश में राजस्थान ही वो एकमात्र बदनसीब सूबा है जिसके हिस्से में मनु आया है .संभवत: मनुवादी यहां सदैव मजबूत स्थिति में रहे है ,इसलिये वे मनुस्मृति के रचनाकार को हाईकोर्ट परिसर के भीतर स्थापित करने में सफल रहे है तथा संविधान के रचयिता बाबा साहब डॉ अम्बेडकर को बाहर चौराहे पर धकेलने में कामयाब हुये.

उस वक्त के अम्बेडकरवादी तथा प्रगतिशील मानवतावादी लोगों व संगठनों का शत शत अभिनंदन कि उन्होंने मनु की मूर्ति के अनावरण के कार्ड छपकर वितरित हो जाने के बावजूद भी 28 जून 1989 को तत्कालीन कार्यवाहक चीफ जस्टिस मिलापचंद जैन के हाथों होने वाले अनावरण समारोह को नहीं होने दिया. कुछ उत्साही भीम सैनिक तो रात के वक्त छैनी हथौडे़ भी लेकर पहुंच गये ,मगर वे कामयाब नहीं हो सके.उन सबको बारम्बार वंदन ,अभिनंदन .


जब जयपुर हाईकोर्ट में लगाई गई मनु मूर्ति का विरोध बढ़ा तो ना केवल अनावरण रूका बल्कि राजस्थान उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने प्रशासनिक मींटिंग क प्रस्ताव पारित किया कि -" मनु के प्रति कोई अनादर भाव रखे बिना परन्तु इस मामले के विवाद को देखते हुये यह प्रस्तावित किया जाता है कि मूर्ति को राजस्थान उच्च न्यायालय परिसर से हटा लिया जाये"

अपने इस प्रस्ताव की पालना के लिये हाईकोर्ट की फुलबैंच ने राजस्थान हाईकोर्ट न्यायिक सेवा संगठन तथा लॉयन्स क्लब के अनुरोध किया कि वे मूर्ति को हटा लें . 

वे हटाते इससे पहले ही विश्व हिन्दु परिषद के केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल के सदस्य आचार्य धर्मेंन्द्र जी अपने पुरखे संघ प्रिय मनु को बचाने हेतु मामले में कूद पड़े.आर्य समाजी सामवेदी जी भी आ गये तथा अपनी लाश पर मूर्ति हटने की उदघोषणा करने लगे.मिलीभगत की बेहतरीम मिसाल यह है कि जिस दिन में स्टे हेतु याचिका लगी और दूसरे ही दिन कोर्ट से स्टे भी मिल गया .तब से मनु की मूरत बिना लोकार्पित हुये खड़ी है.


बरस दर बरस ,तारीख दर तारीख ,सुनवाई ,बहस ,जिरह ,पेशी पर पेशी ..इस तरह तकरीबन तीन दशक होने के आये .वादी ,परिवादी ,फरियादी और विवादी में से कई चल बसे,एकाध जो बच गये ,वे भी चला चली का मेला है.कई आन्दोलन हुये.अम्बेडकर मंच से लेकर मान्यवर काशी राम जी तक और महिला संगठनों व दलित संगठनों से लेकर सुप्रसिद्ध श्रमिक नेता बाबा आढ़ाव तक कई लोगों ,समूहों ,संस्थाओं और संगठनों ने मनु की प्रतिमा को हटाने के लिये आन्दोलन किये,मगर पूरी बेशर्मी से मनु खड़ा रहा.टस से मस भी नहीं हुआ.

तमाम मनुवादी तत्व मनु के पक्ष में खुलकर खड़े थे,आज भी है और आईन्दा भी खड़े रहने को लालायित है.कोर्ट तक ने मामले को कोल्ड स्टोरेज में डाल दिया है,पिछली सुनवाई गुजिश्ता साल 13 अक्टूबर को हुई.राजस्थान हाई कोर्ट का नजारा देखने लायक था.बार तक जाति के आधार पर विभाजित नजर आया.मनु के समर्थक वकीलों ने  मनु प्रतिमा के विरोधी पक्ष के अधिवक्ताओं को बोलने तक नहीं दिया गया. सैकड़ों की तादाद मे विद्वान वकील साहबान उँच नीच की विषम व्यवस्था के स्मृतिकार के पक्ष में खुलकर खड़े हो गये.


ऐसी स्थिति में हाईकोर्ट ने मामले की बहस को टाल दिया और कहा कि मामला भारत सरकार को  गृह विभाग के सचिव के माध्यम से पूरा मामला भेजा जाये.मतलब यह कि गृह सचिव के जरिये  राज्य सरकार एक पक्ष बने और उस आधार पर नोटिस जारी करे ताकि जल्दी से जल्दी जवाब आ सके.

इसके बाद राज्य सरकार की तरफ से कुछ भी कदम नहीं उठाया गया और कोर्ट में भी मामला सुनवाई के लिये नहीं आया.मतलब कि मामला फिर से ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया.यह प्रक्रिया अनंत काल तक दोहराई जायेगी ताकि मनु सदैव हमारी छाती पर खड़ा रहे और चिढ़ाता रहे कि - " हे शूद्रों ,हे स्त्रियों मैं मनु जिसने तुम्हें दास बनाया ,तुम्हारी गुलामी की शास्त्रीय आधार दिया,तुम्हे जानवर से भी बदतर दर्जा दिया और वो जिन्होंने मेरे नियमों को नहीं माना उन्हें दास के साथ साथ अछूत भी बनाया,मैं वो ही मनु तुम्हारे आजाद देश में भी तुम्हारे सिर पर सवार हूं.जिस व्यक्ति ने मेरी लिखी पुस्तक मनुस्मृति को एक दिन जलाया ,मैं आज तक हर दिन उसके लिखे संविधान का मखौल उड़ा रहा हूं "


इस रोज रोज चिढ़ाते मनु का हम कुछ नहीं कर पा रहे है ,क्योंकि मनुवाद फिर से बेहद प्रबल रूप में पुनर्स्थापित हो रहा है. दलित बहुजन मूलनिवासी तथा समानता के समर्थक प्रगतिशील आन्दोलन मनु के प्रति क्षमादान के उदारभाव से भर गये है,उन्हें मनु,मनुस्मृति ,मनु मूर्ति और मनुवाद से अब कोई तकलीफ नहीं बची है ,अब वे वार त्यौहार बतौरे रस्म जय भीम तथा जय जय भीम चिल्लाते है. मोटी तनख्वाह ,तगड़ा फण्ड या बड़ा पद पाते है.उनके लिये अम्बेडकर का दर्शन महज प्रदर्शन भर की विषय वस्तु है.अब वे इतने निर्मम अम्बेडकरवादी हो चुके है कि यथार्थ के नाम पर बाबा साहब को भी बेचकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेने में नहीं चूकते है.यह अपराध किया गया है और किया जा रहा है.

अगर मनुस्मृति के दहनकर्ता बाबा साहब का दर्शन समझ नहीं पड़ रहा है तो हम एक बार फिर हम डॉ अम्बेडकर को पढ़ें ,जानें कि वे क्यों मनु के इतने विरोधी थे ,क्यो उन्होनें मनु की विषैली स्मृति को आग के हवाले किया और क्यों हमें मनुवाद के खिलाफ पुन: एक निर्णायक जंग छेड़नी चाहिये.

जिन्हे मनु से हमदर्दी है ,उन पर हमारा जोर नहीं है.जो मनु के समर्थक है ,उनको हमारा कुछ भी कहना नहीं है.जो साक्षात मनुवादी है ,उनकी मुखालफत करते हुये हम बुद्ध ,कबीर ,फुले ,पेरियार ,रविदास तथा बाबा भीम के वंशजों से कहना है कि मानवता के माथे पर कलंक की भांति खड़ी इस मनु प्रतिमा को हटाने के आन्दोलन का हिस्सा बनिये. 

यह सिर्फ एक निर्जीव मूर्ति को हटाने का अभियान नहीं है ,यह मनुवाद को मिटाने और ब्राह्मणवाद के ताबूत में आखिरी कील ठोंकने का महाभियान है.इससे जुड़िये और इसको सफल कीजिये.

3 जनवरी 2017 को जयपुर से मनुवाद विरोधी अभियान की शुरूआत हो रही है.इस ऐतिहासिक पल के साक्षी होने से चूकिये मत. हम इंतजार में है ,आना  मत भूलिये .

- भंवर मेघवंशी
( स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता )
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दलित अत्याचार में राजस्थान अव्वल : सचिन पायलट

राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट ने एक बयान में कहा कि एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक दलितों पर हो रहे अत्याचार के मामले में राजस्थान अब उत्तर प्रदेश से आगे निकल चुका है। जहाँ उत्तर प्रदेश में दलितों के खिलाफ साल 2013-15 में 23556 मामले दर्ज हुए हैं, वहीं राजस्थान में 23861 मामले दर्ज किये गए है। राजस्थान दलितों पर हो रहे अत्याचार के मामले में नंबर एक पर आ गया है और हालात दिन-ब-दिन और बिगड़ते जा रहे हैं, इसी के चलते माननीय सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को फटकार भी लगाई है।



सचिन पायलट ने कहा कि भाजपा सरकार का पिछले तीन सालों ने दलितों के प्रति जो आचरण रहा है, ये उसी का परिणाम है कि आज राजस्थान दलितों के अत्याचार के मामले में उत्तरप्रदेश को भी पीछे छोड़ कर नंबर एक पर आ गया है।

पायलट ने कहा कि जिस तरह लगातार दलितों पर अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं इससे ये साबित हो जाता है कि सरकार की जो कार्यशैली है वह दलित विरोधी है और मुझे लगता है कि सरकार को प्रदेश से माफी मांगनी चाहिए, खास कर उस वर्ग से जिन्होंने पिछले चुनाव में भाजपा को बहुमत दे कर प्रदेश में सरकार बनायी थी।
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