Beingदलित

List of Scheduled Caste (Dalit) legislators in Gujarat 2017

There are 13 seats reserved for scheduled castes in Gujarat. In the recently concluded assembly elections in December, 2017 maximum 7 members from BJP have been elected to the assembly.

Congress bagged 5 seats and one seat is won by congress supported independent, Jignesh Mewani.

Following is the list of Dalit MLAs in Gujarat




S.No
Name
Constituency
Party
1
MAHESHWARI MALTI KISHOR
Gandhidham
BJP
2
Jignesh Mewani
Vadgam
Independent
3
KARSHANBHAI PUNJABHAI SOLANKI
Kadi
BJP
4
KANODIYA HITU
Idar
BJP
5
PARMAR SHAILESH MANHARBHAI
Danilimda
Congress
6
PARMAR PRADIPBHAI KHANABHAI
Asarwa
BJP
7
SOLANKI NAUSHADJI BHALAJIBHAI
Dasada
Congress
8
LAKHABHAI SAGATHIYA
Rajkot Rural
BJP
9
MUSADIYA PRAVINBHAI NARASHIBHAI
Kalavad
Congress
10
MOHANLAL MALABHAI VALA
Kodinar
Congress
11
MARU PRAVINBHAI TIDABHAI
Gadhada
Congress
12
MANISHA VAKIL
Vadodara City
BJP
13
ISHWARBHAI (ANIL) RAMANBHAI PARMAR
Bardoli
BJP
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अम्बेडकरवाद का भक्तिकाल : दलित गुलामी के नए दौर का प्रारम्भ !

जयपुर में आज 13 अप्रैल 2917 को अम्बेडकर के नाम पर "भक्ति संध्या" होगी। दो केंद्रीय मंत्री इस अम्बेडकर विरोधी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होंगे। अम्बेडकर जैसा तर्कवादी और भक्तिभाव जैसी मूर्खता ! इससे ज्यादा बेहूदा क्या बात होगी ?



भीलवाड़ा में बाबा साहब की जीवन भर विरोधी रही कांग्रेस पार्टी का एस.सी. डिपार्टमेंट दूसरी मूर्खता करेगा। 126 किलो दूध से बाबा साहब की प्रतिमा का अभिषेक किया जायेगा। अभिषेक होगा तो पंडित भी आएंगे ,मंत्रोच्चार होगा,गाय के गोबर ,दूध ,दही ,मूत्र आदि का पंचामृत भी अभिषेक में काम में लिया ही जायेगा । अछूत अम्बेडकर कल भीलवाड़ा में पवित्र हो जायेंगे!

तीसरी वाहियात हरकत रायपुर में होगी 5100 कलश की यात्रा निकाली जाएगी। जिस औरत को अधिकार दिलाने के लिए बाबा साहब ने मंत्री पद खोया ,उस औरत के सर पर कलश,घर घर से एक एक नारियल लाया जाएगा। कलश का पानी और नारियल आंबेडकर की प्रतिमा पर चढ़ाये जायेंगे। हेलिकॉप्टर से फूल बरसाए जायेंगे। जिस अम्बेडकर के समाज को आज भी नरेगा ,आंगनवाड़ी और मिड डे मील का मटका छूने की आज़ादी नहीं है ,उनके नाम पर कलश यात्रा ! बेहद दुखद ! निंदनीय !



एक और जगह से बाबा साहब की जयंती की पूर्व संध्या पर भजन सत्संग किये जाने की खबर आयी है। एक शहर में लड्डुओं का भोग भगवान आंबेडकर को लगाया जायेगा।

बाबा साहब के अनुयायी जातियों के महाकुम्भ कर रहे है ,सामुहिक भोज कर रहे है,जिनके कार्डों पर गणेशाय नमः और जय भीम साथ साथ शोभायमान है।भक्तिकालीन अम्बेडकरवादियों के ललाट पर उन्नत किस्म के तिलक आप हरेक जगह देख सकते है। जय भीम के साथ जय श्री राम बोलने वाले मौसमी मेढकों की तो बहार ही आयी हुयी है।



बड़े बड़े अम्बेडकरवादी हाथों में तरह तरह की अंगूठियां फसाये हुए है,गले में पितर भैरू देवत भोमियाजी लटके पड़े है और हाथ कलवों के जलवों से गुलज़ार है,फिर भी ये सब अम्बेडकरवादी है।

राजस्थान में बाबा साहब की मूर्तियां दलित विरोधी बाबा रामदेव से चंदा ले के कर डोनेट की जा रही है।इन मूर्तियों को देख़ कर ही उबकाई आती है। कहीं डॉ आंबेडकर को किसी मारवाड़ी लाला की शक्ल दे दी गयी है ,कहीं हाथ नीचे लटका हुआ है तो कहीं अंगुली "सबका मालिक एक है " की भाव भंगिमा लिए हुए है।

 ये बाबा साहब है या साई बाबा ? मत लगाओ मूर्ति अगर पैसा नहीं है या समझ नही है तो।

 कहीं कहीं तो जमीन हड़पने के लिए सबसे गन्दी जगह पर बाबा साहब की घटिया सी मूर्ति रातों रात लगा दी जा रही है।

बाबा साहब की मूर्तियां बन रही है ,लग रही है ,जल्दी ही मंदिर बन जायेंगे ,पूजा होगी ,घंटे घड़ियाल बजेंगे,भक्तिभाव से अम्बेडकर के भजन गाये जायेंगे। भीम चालीसा रच दी गयी है,जपते रहियेगा।



गुलामी का नया दौर शुरू हो चुका है। जिन जिन चीजों के बाबा साहब सख्त खिलाफ थे ,वो सारे पाखण्ड किये जा रहे। बाबा साहब को अवतार कहा जा रहा है। भगवान बताया जा रहा है। यहाँ तक कि उन्हें ब्रह्मा विष्णु महेश कहा जा रहा है। 

हम सब जानते है कि डॉ अम्बेडकर गौरी ,गणपति ,राम कृष्ण ,ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश ,भय ,भाग्य ,भगवान् तथा आत्मा व परमात्मा जैसी चीजों के सख्त खिलाफ थे।
वे व्यक्ति पूजा और भक्ति भाव के विरोधी थे। उन्होने इन कथित महात्माओं का भी विरोध किया ,उन्होंने कहा इन महात्माओं ने अछूतों की धूल ही उड़ाई है।

पर आज हम क्या कर रहे है बाबा साहब के नाम पर ? जो कर रहे है वह बेहद शर्मनाक है ,इससे डॉ अम्बेडकर और हमारे महापुरुषों एवम महस्त्रियों का कारवां हजार साल पीछे चला जायेगा। इसे रोकिये। 

बाबा साहब का केवल गुणगान और मूर्तिपूजा मत कीजिये। उनके विचारों को दरकिनार करके उन्हें भगवान मत बनाइये । बाबा साहब की हत्या मत कीजिये। 

आप गुलाम रहना चाहते है ,बेशक रहिये ,भारत का संविधान आपको यह आज़ादी देता है ,पर डॉ अम्बेडकर को प्रदूषित मत कीजिये।

आपका रास्ता लोकतंत्र और संविधान को खा जायेगा। फिर भेदभाव हो ,जूते पड़े,आपकी महिलाएं बेइज्जत की जाये और आरक्षण खत्म हो जाये तो किसी को दोष मत दीजिये।

 इन बेहूदा मूर्तियों और अपने वाहियात अम्बेडकरवाद के समक्ष सर फोड़ते रहिये।रोते रहिये और हज़ारो साल की गुलामी के रास्ते पर जाने के लिए अपनी नस्लों को धकेल दीजिये।गुलामों से इसके अलावा कोई और अपेक्षा भी तो नहीं की जा सकती है।

 जो बाबा साहब के सच्चे मिशनरी साथी है और  इस साजिश और संभावित खतरे को समझते है ,वो बाबा साहब के दैवीकरण और ब्राह्मणीकरण का पुरजोर विरोध करे।मनुवाद के इस स्वरुप का खुल कर विरोध करे। 

अम्बेडकरवाद में भक्तिभाव  के लिए कोई जगह नहीं है ।

- भंवर मेघवंशी 
( स्वतंत्र पत्रकार एवम सामाजिक कार्यकर्ता )
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ख़ामोशी तोड़ो दलितों, आदिवासी बच्चियों के बलात्कार और हत्या पर पसरी यह चुप्पी भयानक है

आखिर राजस्थान में दो दलित छात्राओं से बलात्कार व आत्महत्या की नृसंश घटना पर इस देश में कोई मोमबत्ती क्यों नहीं जली?

राजस्थान के सीकर जिले के नीम का थाना क्षेत्र के भगेगा गाँव के एक दलित बलाई परिवार की प्रथम वर्ष में पढ़ने वाली दो सगी बहनों के साथ तीन सवर्ण युवाओं ने घर में घुस कर सामुहिक बलात्कार किया।

बलात्कारी पीड़िताओं के भाई के आ जाने के बाद भाग छूटे। 17 व 18 साल की इन दोनों दलित छात्राओं ने बलात्कार के बाद ट्रेन के आगे कूद कर जान दे दी।

ये दर्दनाक और शर्मनाक घटना 5 अप्रैल 2017 को दिन में घटी। 8 घंटे प्रयास करने के बाद नामजद मुकदमा दर्ज किया गया। मामला बलात्कार, दलित अत्याचार,नाबालिग के लैंगिक शोषण का होने के बावजूद भी जानबूझकर सिर्फ आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण की धारा 306 में मामला दर्ज किया गया। इलाके के सरपंच, विधायक और पुलिस उप अधीक्षक सब आरोपियों की जाति के है। पूरे मामले को शुरू से बिगाड़ा जा रहा है।

राजस्थान में सक्रिय विभिन्न जाति संगठन ,समाज की महासभाएं, सामाजिक संगठन ,महिला संगठन ,दलों के गुलाम प्रकोष्ठ व मोर्चे तथा दलित संगठनों को भी कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। सब  अपने अपने गोरखधंधे में व्यस्त है। एक आध को छोड़ कर कोई भी इस गरीब पीड़ित दलित परिवार से मिलने तक नहीं पंहुचा।

सवाल उठता है कि महिलाओं के साथ यौनिक बर्बरता के खिलाफ जनपथ तथा जंतर मंतर पर सड़कों पर उतरने वाले साथी ,उछल उछल कर नारे लगाने वाले क्रन्तिकारी, मोमबत्तियां जलाने वाले संवेदनशील भारतीयों की संवेदना बलात्कार पीड़ित दलित आदिवासी महिलाओं के लिए संवेदन शून्यता से क्यों भर जाती है?

मुझे मालूम है कि आप सब लोग बाबा साहब की 126वी जयंती के समारोह को सफल बनाने में सलंग्न होंगे, मगर इस बार के आयोजन में अगर हम भगेगा की इन दलित बहनों के साथ हुए अमानवीय अत्याचार अन्याय के खिलाफ नहीं बोलेंगे तो फिर कब बोलेंगे?

14 अप्रैल को हर जगह इस क्रूर कांड की कड़ी भर्त्सना कीजिये, पीड़ितों के लिए न्याय मांगिये,दलित आदिवासी एवम अन्य वंचित तबके की पीड़ित स्त्रियों के लिए आवाज़ उठाइये। अगर हम ही नहीं बोलेंगे तो हमारे लिए कौन बोलेगा। कोशिश कीजिये भगेगा जाने की, पीड़ित परिवार को संबल देने की ,उनके संघर्ष में सहायक होने की।
मानव अधिकार कार्यकर्ता कैलाश मीणा का आभार, जिन्होंने इस बारे में जानकारी दी और पीड़ित परिवार से मिलवाया। आप भी इस बारे में साथी Kailash Mina से सीधे इस नम्बर  09928136988 बात कर सकते है।
इंतज़ार मत कीजिये, न्याय की लड़ाई के लिए आगे आना ही अम्बेडकर के कारवां को आगे बढ़ाना है। अगर हम भगेगा के लालचंद वर्मा के परिवार को न्याय दिला पाये तो यह अम्बेडकर जयंती मनाना सार्थक हो जायेगा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

संपादन- भवेंद्र प्रकाश
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गुजरात : गाय का कंकाल फेंकने से मना किया तो गर्भवती दलित महिला सहित पूरे परिवार को पीटा



गुजरात के बनासकांठा जिले के करजा गांव में एक गर्भवती दलित महिला सहित उसके परिजन की उस वक्त कथित तौर पर बुरी तरह पिटाई की गई, जब उन्होंने एक गाय का कंकाल कहीं दूर फेंक आने से इनकार कर दिया.


पुलिस ने शनिवार को बताया कि इस सिलसिले में आईपीसी और एससी-एसटी (उत्पीड़न रोकथाम) कानून की विभिन्न धाराओं के तहत छह लोगों को गिरफ्तार किया गया है. निलेश रनवासिया की ओर से दर्ज कराई गई प्राथमिकी के मुताबिक, दरबार समुदाय के करीब 10 लोगों ने शुक्रवार रात उसकी गर्भवती पत्नी सहित उसके पूरे परिवार की उस वक्त पिटाई की, जब उन्होंने गाय के शव को दूर फेंक आने से इनकार कर दिया.
गर्भवती महिला और दो अन्य औरतों सहित छह लोग पिटाई की वजह से घायल हुए हैं. गर्भवती महिला को पालनपुर सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि मामूली तौर पर जख्मी हुए निलेश एवं अन्य को प्राथमिक उपचार के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई.
बनासकांठा के पुलिस अधीक्षक नीरज बड़गूजर ने कहा कि पुलिस तुरंत गांव में पहुंची और कुछ ही घंटों के भीतर छह लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तार किए गए लोगों की पहचान बतावर सिंह चौहान (26), मकनुसिंह चौहान (21), योगीसिंह चौहान (25), बावरसिंह चौहान (45), दिलवीर सिंह चौहान (23) और नरेंद्र सिंह चौहान (23) के तौर पर की गई है. बड़गूजर ने कहा कि गांव में तनाव बढ़ने के कारण पुलिस ने सुरक्षा कड़ी कर दी है और गश्त बढ़ा दी है.

Source: http://khabar.ndtv.com/
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पत्नी को 'ऊंची जाति' वालों ने नहीं लेने दिया कुएं से पानी, दलित पति ने खोद दिया कुआं

सूखे का मार से परेशान महाराष्ट्र में दलित ने जातिवाद को अपने अंदाज में बुरी तरह से जवाब दिया है। महाराष्ट्र के वाशिम जिले के कलाांबेश्वर में रहने वाले बापुराव ताजणे की पत्नी को जब ऊंची जाति के पड़ोसियों ने कुएं से पानी नहीं लेने दिया तो उसने अपनी पत्नी के लिए कुआं खोद दिया और 40 दिनों के अंदर ही उससे पानी निकलने लगा।


ताजणे ने जो कुआं खोदा उसका इस्तेमाल आज सभी दलित कर रहे हैं। ताजणे 8 घंटे मजदूरी करने के बाद करीब 6 घंटे रोज कुआं खोदने में लगाते थे। ताजणे द्वारा कुआं खोदने पर उनके पड़ोसी और परिजन मजाक उड़ाते थे। लोगों का मानना था कि ऐसे पथरीले इलाके में पानी कहां मिलेगा वो भी तब जबकि क्षेत्र के आसपास के तीन कुएं और बोरवेल सूख चुके थे।

बता दें कि कुआं खोदने के लिए करीब पांच लोगों की आवश्यकता होती है लेकिन ताजणे ने यह काम कर दिखाया। अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को ताजणे ने बताया कि मैं गांव में लड़ाई झगड़ा नहीं चाहता लेकिन उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि हम गरीब दलित हैं। जिस दिन यह घटना हुई थी, मैं बहुत दुखी हुआ था। ताजणे ने यह भी कहा कि पत्नी को जब पानी नही दिया गया तो मैंने किसी से कुछ भी न मांगने की कसम खाई और मालेगांव से कुआं खोदने का सामान लेकर आए और फिर खुदाई शुरु कर दी। मैंने ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करता हूं कि मुझे सफलता मिली।

ताजणे की पत्नी संगीता का कहना है कि मैंने अपने पति की कोई मदद नहीं की जब तक कुएं से पानी नहीं निकल गया।
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कुंभ में भी छुआछूत, दलितों और आदिवासियों के अलग स्नान की व्यवस्था

उज्जैन कुंभ में 11 मई को दलितों, आदिवासियों को अलग से स्नान कराने की आरएसएस के संगठन की योजना पर विवाद शुरू हो गया है । कांग्रेस औऱ शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती ने इस पर सवाल उठाए हैं।
उज्जैन कुंभ में आरएसएस से जुड़ी संस्था पंडित दीनदयाल विचार प्रकाशन ने 11 मई को समरसता स्नान और शबरी स्नान का आयोजन किया है। इसका आयोजन कुंभ के दौरान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए अलग से किया जा रहा है ।
इस योजना पर शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती ने कहा है,’ समरसता स्नान के जरिए बीजेपी सियासी नौटंकी कर रही है । वे ऐसा करके दलितों को और नीचा दिखा रहे हैं ।’
शंकराचार्य ने यह भी कहा कि दलितों को क्षिप्रा में स्नान करने से किसी ने नहीं रोका, वे जब चाहे स्नान कर सकते हैं इसके लिए अलग से दिन निर्धारित करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। नदियां कभी किसी की जाति नहीं पूछती।
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आंबेडकर के आगे नतमस्तक क्यों संघ और भाजपा?


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Image captionमोदी सरकार आंबेडकर के 125वें जयंती वर्ष में कई कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है

भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने 26 नवंबर को बड़े पैमाने पर संविधान दिवस मनाने का ऐलान किया था.
आज के दिन भी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने आंबेडकर जयंती पर उनके सम्मान में बड़ी-बड़ी बातें कही हैं .
अलग-अलग मंत्रालयों ने लेख-भाषण प्रतियोगिता के साथ समानता-दौड़ आदि का भी आयोजन किया.
इसे एक बड़े अभियान के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है, जिसका दूसरा हिस्सा है अचानक राष्ट्रीय स्वयंसेवक और भारतीय जनता पार्टी के भीतर बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के प्रति उमड़ी श्रद्धा और प्रेम भाव.
दूसरे, यह पिछले एक साल से अब तक जानी हुई तिथियों को नई-नई राष्ट्रीय तिथियों से बदलने की भी एक कवायद है.


जिन दिवसों को हिलाया नहीं जा सकता उनसे जुड़े संदेश को पूरी तरह परिवर्तित कर देने की कोशिश तो साफ़ दिख रही है.


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Image captionदलितों के मसीहा कहे जाने वाले डॉ. आंबेडकर भारतीय संविधान के निर्माता माने जाते हैं

गांधी जयंती को स्वच्छता दिवस में तब्दील कर गाँधी की राजनीति और जीवन के मूल संप्रदायवाद विरोधी विचार को सार्वजनिक स्मृति से मिटा देने का षड्यंत्र पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है, भले ही गाँधी को सरकार का स्वच्छता अभियान का ‘ब्रांड एंबेसडर’ क्यों न बना दिया गया हो.
जो चश्मा गांधी के चेहरे से छिटककर बिड़ला भवन की ज़मीन पर तब गिर गया था, जब नाथूराम गोडसे ने मुसलमानों का पक्षधर होने के अपराध की सज़ा देने के लिए उन्हें गोली मारी थी, उसे उठाकर संघ की सरकार ने सरकारी विज्ञापन में सजा दिया है.
उसी तरह शिक्षक दिवस को शिक्षकों से छीनकर प्रधानमंत्री का उपदेश दिवस बना दिया गया है जिसमें शिक्षकों की उपस्थिति उनका उपदेश सुनाने के लिए इंतज़ामकार भर की रह गई है.
14 नवंबर के कार्यक्रम से नेहरू की तस्वीर ग़ायब कर दी गई है और इंदिरा को तो याद करने का सवाल ही नहीं उठता.


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राष्ट्र दरअसल कल्पना का ख़ास ढंग का संगठन ही है. इसलिए प्रतीकों का काफ़ी महत्व होता है. जिन प्रतीकों के माध्यम से हम अपनी राष्ट्र की कल्पना को मूर्त करते हैं, उनकी जगह नए प्रतीक प्रस्तुत करके एक नई कल्पना को यथार्थ करने का प्रयास होता है.
तो हम उस राजनीतिक दल के संविधान प्रेम को कैसे समझें जिसकी पितृ-संस्था, यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उस पर मात्र इसलिए अपना विश्वास जताया था जिससे उस पर गाँधी की हत्या के बाद लगा प्रतिबंध हटाया जा सके.
आख़िर यही शर्त सरदार पटेल ने उसके सामने रखी थी. वरना उसका ख़्याल था कि मनुस्मृति से बेहतर संविधान क्या हो सकता है!
याद रहे कि इस संगठन ने तिरंगा ध्वज को भी मानने से इनकार किया था यह कहकर कि तीन रंग अशुभ और अस्वास्थ्यकर होते हैं.
इस तिरंगे के चक्र पर इस संघ और दल के एक वरिष्ठ नेता, अब मूक मार्गदर्शक लालकृष्ण आडवाणी ने यह कहकर ऐतराज़ जताया था कि यह बौद्ध धर्म का प्रतीक है. फिर ये सबके सब संविधान और तिरंगे के प्रेमी कैसे हो गए?


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Image captionगूगल ने भी आंबेडकर की जयंति पर डूडल बनाया था

भारतीय संविधान की आत्मा है बराबरी और इंसाफ़. आंबेडकर ने इस संविधान के बनने के बहुत पहले कहा था कि विधायिका जनता का प्रतिनिधित्व करती है, न कि मात्र बुद्धिजीवियों का.
उनका आशय पढ़े-लखे लोगों को ही प्रतिनिधित्व का अधिकार देने से था. भारतीय संविधान जनता को संप्रभु मानता है और भारतीय राज्य अपनी संप्रभुता उसी जनता से ग्रहण करता है. यह ऐसा विलक्षण संविधान है जिसने एक ही बार हर वयस्क को मताधिकार दिया, उसमें किसी तरह की कोई शर्त नहीं लगाई.
ऐसा करके उसने साधारण भारतीय जन की विवेक क्षमता पर भरोसा जताया. क्या जनतंत्र जैसे आधुनिक विचार का अभ्यास अनपढ़ जनता कर पाएगी? साल-दर-साल उस जनता ने इस विश्वास को सही साबित किया.
इस तरह एक तरफ़ जहां संविधान जनता के लिए एक कसौटी है तो दूसरी ओर जनता संविधान की कसौटी है.
इस बात को ध्यान में रखते हुए कम से कम तीन राज्य सरकारों की कोशिश देख लें जो उन्होंने स्थानीय निकायों के चुनाव में जनता की भागीदारी को सीमित करने के लिए की.
एक ख़ास दर्जे तक पढ़े होने पर ही जन प्रतिनिधि बनने की योग्यता होगी, इस तरह का क़ानून लाने का प्रयास गुजरात, राजस्थान और हरियाणा की भारतीय जनता पार्टी की सरकारें कर रही हैं.
यह भारतीय संविधान की मूल आत्मा के ख़िलाफ़ है. ये सरकारें जनता के एक बड़े हिस्से को जनता का प्रतिनिधित्व करने के अयोग्य ठहरा रही हैं.


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आज़ादी के बाद से साधारण जन का ऐसा अपमान शायद ही कभी किया गया हो. उसी तरह आज के प्रधानमंत्री के नेतृत्व में गुजरात सरकार ने सबको जबरन मतदान करने संबंधी क़ानून भी पेश किया था.
यह भी ध्यान रखें कि इसी प्रधानमंत्री के नेतृत्व में गुजरात में गाँवों को इसके लिए उत्साहित किया जा रहा था कि वे बिना चुनाव के समरस ग्राम-पंचायतें बना लें.
बिना चुनाव के गाँवों में सर्व-सहमति से पंचायतें जहाँ बनेंगी, उन गाँवों को अधिक आर्थिक अनुदान मिलेगा, यह प्रलोभन भी दिया गया.
एक तरफ़ जबरन मतदान, दूसरी ओर मतदान रहित ग्राम-पंचायत चुनाव, तीसरी तरफ़ जन प्रतिनिधि बनने के रास्ते में रोड़े अटकाना, यह सब उस भारतीय जनता पार्टी की सरकारें कर रही हैं जो आज धूमधाम से संविधान का उत्सव मनाना चाहती है.
इसी सरकार के वित्त मंत्री राज्यसभा को ग़ैरज़रूरी ठहरा रहे हैं क्योंकि वह उनकी हर पेशकश पर अपनी मुहर नहीं लगा रही है.
याद रहे कि इसी दल की सरकार ने राजस्थान में उच्च न्यायालय के सामने हिंदुओं के आदि विधिवेत्ता मनु की प्रतिमा भी लगवा दी है. एक है वर्तमान की मजबूरी, यानी संविधान की रक्षा के लिए बना न्यायालय और दूसरा है भविष्य का लक्ष्य, यानी मनुस्मृति का भारत.


Image copyrightEPA

2015 एक ऐसे साल के रूप में याद किया जाएगा जब भारत के अल्पसंख्यक सबसे अधिक असुरक्षित महसूस कर रहे थे.
भारत के संविधान की बुनियादी प्रतिज्ञा अल्पसंख्यकों के सारे अधिकारों की हिफ़ाज़त और उन्हें मुल्क पर बराबरी का हक़ देने की है.
आज दिन ऐसा है कि उनके भीतर की इस असुरक्षा की बात करने को देशद्रोह जैसा बड़ा अपराध भी घोषित कर दिया गया है.
संविधान आज उनके हाथों में है जो बरसों भारत को हिंदू राष्ट्र में बदल देने का सपना देखते रहे थे. वे जब संविधान का जश्न मनाएं, तो जश्न दरअसल उस पर क़ब्ज़े का है.
Source: http://www.bbc.com/
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संपन्न दलित खुद ही छोड़ दें आरक्षणः चिराग पासवान

लोकजनशक्ति पार्टी (एलजेपी) नेता और जमुई से सांसद चिराग पासवान ने समृद्ध दलितों से स्वेच्छा से आरक्षण छोड़ देने की अपील की है। चिराग ने कहा कि दलितो के समृद्धशाली तबके को उसी तरह आरक्षण त्याग देना चाहिए जिस तरह देश के संपन्‍न लोग गैस सब्सिडी का त्‍याग कर रहे हैं। चिराग के इस बयान से एक नई बहस के शुरू होने का अंदेशा बढ़ गया है।संपन्न दलित खुद ही छोड़ दें आरक्षणः चिराग पासवान
अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में चिराग ने कहा, ‘मेरे विचार से, सभ्य वित्तीय पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों को आरक्षण छोड़ देना चाहिए। इससे इस समुदाय के बाकी लोगों को आगे बढ़ने के और बेहतर करने के अवसर मिलेंगे। दरअसल, जिन्हें आरक्षण की सही मायने में जरूरत है उन्हें अधिक से अधिक मदद मिल पाएगी।’ हालांकि चिराग ने ये भी कहा कि इसे कानून बनाकर नहीं बल्कि लोगों को जागरुक कर प्रोत्साहित करना चाहिए।
एलजेपी सांसद ने खुद को ‘जातिविहीन’ समाज के उद्भव के प्रति आशान्वित बताया। चिराग ने कहा, ‘यह मेरा अंतिम उद्देश्य है। मैं बिहार से आता हूं जहां जातिगत समीकरण राजनीति पर हावी रहते हैं। यूपी और बिहार को इस उद्देश्य को हासिल करने में अहम भूमिका निभानी होगी।’
क्या बीजेपी ने यूपी, पंजाब में ओबीसी अध्यक्ष बनाकर पिछड़ी जाति को साधने की कोशिश की है? इस सवाल के जवाब पर जूनियर पासवान ने कहा कि लोग इस फैसले की टाइमिंग को लेकर सवाल कर सकते हैं लेकिन इन सबका ध्यान किए बिना हमें यह तो स्वीकार करना ही होगा कि ऐसे और भी नेताओं को आगे लेकर आने की जरूरत है। बीजेपी समाज के इस धड़े से योग्य लोगों को आगे लेकर आ रही है, जो एक अच्छा संकेत है। ऐसे और प्रतिनिधित्व हमारी राजनीति में बड़े बदलाव लेकर आएंगे।
हालांकि, यूपी की ताकतवर दलित नेता और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को निशाने पर लेते हुए इस युवा सांसद ने कहा कि अपने शासन के दौरान उनके पास पूरी ताकत थी, अगर वह चाहतीं तो खुद से संबंध रखने वाले समाज के लिए काफी कुछ कर सकती थीं लेकिन वह मूर्तियां बनाने तक ही सीमित रह गईं।
Source: http://khabar.ibnlive.com/
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