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बिहार विधानसभा चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे दलित वोट

बिहार चुनाव में लगभग महीने भर का वक्त बचा है। लेकिन NDA गठबंधन में सीटो के बटवारे को लेकर अभी कोई समझौता नहीं हो पाया हैं। दरअसल दलित नेता जीतन राम मांझी और रामविलास पासवान के बीच दलितों के बड़े नेता होने की जुंग छिड़ी हुई हैं। 

बिहार की कुल आबादी में 15.9% दलित हैं। और राज्य में 18.44% वोटर दलित हैं। यानि सारे दलित वोट को मिला दें तो कमोबेश यादव वोट बैंक की बराबरी का मामला बन जाता है। इसमें भी SC कोटे के वोट का 70% हिस्सा रविदास, मुसहर और पासवान जाति का है। यानि एक प्रभावी वोट बैंक। बिहार में कुर्मी, मुसलमान और यादव वोट बैंक को अगर आरजेडी, कांग्रेस और जेडीयू अपने हिस्से में मान कर चल रहे हैं तो बीजेपी अगड़ी जातियों और व्यापारी वर्ग के वोट पर दांव लगाए बैठी है। ऐसे में सूबे में दलित वोट बैंक सत्ता की दिशा और दशा दोनों तय कर सकता है इस बार।

वैसे तो दलित लगभग हर चुनाव में अपना मसीहा तलाशता है। पहले कांग्रेस पर भरोसा किया, वहां मुंह की खाई तो लालू यादव की आरजेडी का दामन थामा। वहां भी बहुत कुछ नहीं मिला तो नीतीश कुमार की जेडीयू का रुख किया। नीतीश कुमार ने भी SC कैटेगरी की 22 जातियों में से 21 को महादलित घोषित कर अपनी तरफ से कोशिशें शुरू कीं लेकिन उनके रास्ते में उनका ही प्यादा आ खड़ा हुआ। मांझी ने लगभग 8 महीने के कार्यकाल में अपना सारा फोकस कमोबेश इस बात पर रखा कि वह कैसे महादलित का चेहरा बन सके। इसी कोशिश के तहत उन्होंने कुर्सी से हटते हटते भी कई फैसले महादलितों के हक में लिए और पासवान जाति को भी महादलित की लिस्ट में शामिल कर दिया।

ऐसे में इस बार लड़ाई दिलचस्प हो गई। बीजेपी न सिर्फ मांझी को साथ लेकर एक दलित चेहरे को सम्मान देने की बात कर रही है बल्कि मांझी से कुर्सी छीने जाने को भी दलित के अपमान का मुद्दा बना रही है। इस बीच बीजेपी के लिए दिक्कत यह है कि उसे तय करना है कि उसके लिए दलित वोट ज्यादा कौन लाएगा, रामविलास पासवान या जीतन राम मांझी। बीजेपी की यह दुविधा क्यों है इसे समझाने के लिए नीचे लिखे आंकड़ो पर गौर करना ज़रूरी हैं।

बिहार विधानसभा में कुल आरक्षित सीटें 38 हैं। इसमें से 2005 में JDU को 15 सीटें मिली थीं और 2010 में 19 सीटें। यह याद रखिएगा कि इन चुनावों में मांझी JDU के साथ थे। अब BJP का हिसाब किताब देख लीजिए। BJP के खाते में 2005 में 12 सीटें आईं थीं और 2010 में 18, यानि NDA गठबंधन ने पिछले चुनाव में 38 में से 37 सीटें जीती थीं। RJD को 2005 में 6 सीटें मिली थीं जो 2010 में घटकर एक रह गई थी। 2005 में 2 सीट जीतने वाली LJP ने तो 2010 में इन सीटों पर खाता तक नहीं खोला और कांग्रेस का भी यही हाल था।

LJP के पास रामविलास पासवान का चेहरा है जो 4.5% पासवान वोट पर पकड़ का दावा करते हैं। मांझी जी का हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा यानि 'हम' के पास सिर्फ जीतन राम मांझी का ही आसरा है क्योंकि वह 5.5% मुसहर जाति के वोट पर असर डाल सकते हैं। इसके अलावा सत्तारूढ़ JDU में भी कई दलित चेहरे हैं। हांलाकि नीतीश कुमार दलित चेहरा तो नहीं हैं लेकिन दलितों के लिए बहुत कुछ करने का दावा करके वोट मांगते रहे हैं। उनके अलावा पार्टी में उदय नारायण चौधरी हैं, मंत्री श्याम रजक हैं और एक और चेहरा रमई राम का है।

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