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गुजरात में छिड़ सकता हैं जाति युद्ध, दलित भी हो सकते हैं प्रभावित

कुछ दिन पूर्व इसी ब्लॉग की एक पोस्ट पर कमेंट करते हुए हमारे कुछ गुजराती पाठको ने कमेंट किया था और अपनी व्यथा सुनाई थी। उनका कहना था की गुजरात के कुछ क्षेत्रो में पटीदार या पटेल लोगो की दादागिरी चरम पर हैं। पटेल लोग आरक्षण के लिए मांग कर रहे हैं और अपना गुस्सा आस-पास के गावों में रहने वाले दलितो तथा आदिवासियो पर निकाल रहे हैं। इस से पहले भी पटीदारों के जुल्मो की खबर सुनने को मिल जाती थी। लेकिन अब उन की अन्य पिछड़ा बर्ग  ( OBC ) में सामिल होने की की मांग किसी से छुपी नहीं हैं उन्होने ने इस के लिए आंदोलन सुरू कर दिया हैं।

एक अंग्रेजी अखबार में छपी खबर के अनुसार राज्य में जातिगत हिंसा का माहौल बनता जा रहा हैं। पाटीदार आर्थिक रूप से गुजरात के सबसे सम्पन्न लोग माने जाते हैं। राज्य की बर्तमान मुख्यमंत्री आनंदिबेन पटेल भी इसी जाती से आती हैं। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल, चिमनभाई पटेल भी इसी समाज से रिस्ता रखते हैं। अतः राजनीतिक रूप से भी इनकी संपन्नता का अंदाजा लगा जा सकता हैं। राज्य के दलित और आदिवासी इन लोगो के खेतो में काम करके अपना गुजर बसर करते हैं।

आरक्षण की मांग करने वाले पटेल समुदाय ने 25 अगस्त को एक महा-रैली का आयोजन करने का फैसला किया हैं। राज्य की अन्य जतिया जैसे चौधरी, ठाकोर, कोली, प्रजापति, आदि पटीदारो को OBC दर्जा मिलने का विरोध कर रहे हैं। अगर 25 अगस्त को पटेलों की रैली होती हैं तो अन्य जातीया भी 27 व 30 अगस्त को उसी तरह की रैलि करेगी। राज्य में भिभिन्न जातियो के बीच झड़पे अभी से सुरू हो गयी हैं जिनके आने वाले दिनो में बढ्ने की असंका हैं। आने वाले दिनो में पटेल अपनी माग को लेकर आंदोलन को तेज करेंगे और बाकी जातिया जो पहले से OBC में हैं वो इसका विरोध करेगी अतः विवाद होना निश्चित हैं।

राज्य में इस से पहले भी 1981 और 1985 में इस तरह की जातिगत हिंसाएं हो चुकी हैं। 1981 में पटेलों और दलितों & आदिवासियों के बीच तथा 1985 में पटेलों व ऊँची जातियों के बीच। आरक्षण के मुद्दे को लेकर राज्य का सामाजिक ताना-बाना टूटता नजर आ रहा हैं। वैसे भी राज्य के ग्रामीण इलाको में पटेलों व दलितों के बीच छोटी मोटी झड़पें होती रहती हैं जिनमें दलित और आदिवासियों को हमेशा नुकसान उठाना पड़ता हैं।

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