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एक ऐसा मंदिर जहां रोज दलित चढ़ाता है पहला भोग, लोग लेते हैं प्रसाद

प्राचीन समय से मंदिरों में दलित जाति के लोगों के जाने पर पाबंदी थी। यदि कोई दलित चला भी जाता था तो पूरे मंदिर को गंगा जल से धोया जाता था। ये कुरीतिया  देश में काफी जगह अभी भी मौजूद हैं लेकिन आपको जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि राजस्थान में नागौर के पास मेड़ता में एक ऐसा मंदिर है जहां जाने पर आपको जातिगत भेद-भाव से दूर केवल भक्ति-भाव के दर्शन होंगे। दरअसल इस मंदिर में पहला भोग एक मोची का परिवार लगाता है। ये परंपरा काफी पुरानी है। इस भोग को लोग प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं। इस प्रसाद को लेने वालों का लंबा तांता लगा रहता है।

मेड़ता नगर ऐसा स्थान है जहां पिछले लगभग पांच सौ वर्षों से बिना भेदभाव और वर्ण व्यवस्था के, सभी धर्म और जाति के भक्त भगवान चारभुजानाथ मंदिर में प्रवेश कर ठाकुरजी के दर्शन करने आते हैं। यहां पहले भोग के लिए लंबी कतार लगती है। जैसे मोची का परिवार यह भोग लगाता है, इसे पाकर लोग खुद को धन्य मानते हैं।

इस मंदिर के निर्माण व मूर्ति के बारे में यह किस्‍सा प्रचलित है कि मेड़ता के शासक राव दूदाजी के समय में वर्तमान मंदिर के स्थान मोची रामधन निवास करते थे। रामधन ईश्वर उपासक व धार्मिक प्रवृति का व्यक्ति थे। वे अपनी आजीविका के लिए जूते बनाया करते थे। इसके अलावा गौवंश की सेवा करने के लिए गायें भी चराते थे।

रामधन की एक गाय भरपूर आहार दिए जाने के बावजूद भी घर पर दूध नहीं दिया करती थी। रामधन की पत्नी का तर्क था कि इस गाय का दूध कोई और निकालकर ले जाता है। धर्मपत्नी की इस शिकायत के बाद एक दिन रामधन गाय के पीछे छिपकर गए। उन्होंने देखा कि, गाय कूड़े के ढेर पर खड़ी है और कोई बालक उसका दूध सीधे थनों से पी रहा है। रामधन ने दूध पीने वाले को देखकर टोका तो वह बालक वहीं पर एक काले पत्थर की मूर्ति में परिवर्तित हो गया। इस पर रामधन आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने राव दूदाजी को उसकी सूचना दी। राव दूदाजी वहां आए तो वे भी दंग रह गए। उन्होंने जब वहां खुदाई करवाई तो काले पत्थर की चार भुजाओं वाली मूर्ति निकली। इसलिए मूर्ति के नाम पर मंदिर का नाम चारभुजानाथ रखा गया। और चारभुजानाथ भगवान की मूर्ति को स्थापित कर मंदिर का रूप दिया। धीरे-धीरे मंदिर का स्वरूप विस्तार लेता गया।

मंदिर प्रांगण में भक्त शिरोमणि मीराबाई की मूर्ति ठाकुरजी के मंदिर के ठीक सामने स्थापित की गई ताकि मंदिर खुलते ही मीराबाई को सर्वप्रथम ठाकुरजी के दर्शन हों। जब तक मंदिर खुला रहता है ठाकुरजी की अनन्य भक्त मीराबाई व ठाकुरजी की नजरें एक दूसरे पर पड़ती रहती हैं।

भगवान चारभुजानाथ की पूजा-अर्चना के करने के लिए श्रद्धालुओं प्रतिदिन पांच बार आरती करते हैं। मंदिर खुलते ही सुबह पांच बजे मंगला आरती, 10 बजे विशेष आरती, साढ़े 12 बजे राजभोग, सायंकालीन आरती व रात्रि को शयन आरती की जाती है। मंगला आरती में रामधन मोची के वंशज प्रथम भोग लगाते हैं।

इस मंदिर के गर्भगृह में ठाकुरजी की मूर्ति को कीमती हीरों व रत्नों से सजाया गया। यह रत्न अपनी चमक से रोशनी बिखेरते रहते हैं। इस मंदिर के स्थापना से ही मोची समाज के लोगों को पूजा के लिए प्राथमिकता दी जाती है। यह व्यवस्था अब भी कायम है। इस मंदिर के दर्शन करने के लिए देश विदेश से पर्यटक आते रहते है।

इस मंदिर में भाद्रपद माह में 8 दिन तक विशेष मेला लगता है। इस दौरान मीरा जयंती महोत्सव मनाया जाता है। जिसमें देश विदेश के हजारों श्रद्धालु शामिल होकर अपने आप को धन्य समझते हैं। इस अवधि में हर सप्ताह भजन कीर्तन का आयोजन होता है जिसमें ठाकुरजी के समक्ष सभी समाज की भजन मंडली बारी-बारी से हिस्सा लेती है।

इस परंपरा का पिछले 45 सालों से निर्वहन कर रहे भजन दास गहलोत ने dainikbhaskar.com को बताया कि यह परंपरा साढ़े पांच सौ साल पुरानी है। इसके तहत सबसे पहले पुजारी मंदिर की साफ-सफाई करते हैं। इसके बाद भगवान को स्नान कराया जाता है। पोशाक धारण कराई जाती है। उसके बाद मोची जाति की ओर से बाल भोग चढ़ाया जाता है। इसके बाद मंदिर का पट खुलता है। पट खुलने के बाद प्रात: कालीन आरती होती है। आरती के बाद जो भक्त आते हैं उन्हें प्रसाद वितरित किया जाता है।

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