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सामाजिक बदलाव: दलित-आदिवासी युवा कराएंगे हवन-यज्ञ

अब से आठ माह पहले तक जिन युवक-युवतियों ने श्रीरामचरित मानस, श्रीमद्भागवत गीता और वेद-पुराण को कभी खोलकर नहीं देखा था, आज वे इसमें निपुण हैं। किसी बड़े विद्वान की तरह ही वे अब कथा, पूजा-पाठ, हवन-यज्ञ कराते हैं।
खास बात यह है कि वे जिस वर्ग से आते हैं, उस वर्ग के लोग ऐसा करने के बारे में सोच भी नहीं सकते। दलित-आदिवासी समाज के 8 युवक और 4 युवतियां 8 माह का प्रशिक्षण लेकर कर्मकांड कराने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। यह बड़े सामाजिक बदलाव की निशानी है।
इन दलित व आदिवासी युवक-युवतियों को कर्मकांड का 8 माह का प्रशिक्षण दिया गया। दो महीने का प्रशिक्षण उन्हें शिवपुरी में दिया गया। इसके बाद युवतियों को 6 महीने के प्रशिक्षण के लिए अयोध्या और युवकों को गुजरात भेजा गया।
जहां विद्वानों ने उन्हें धार्मिक ग्रंथों और क्रियाओं के अध्ययन के साथ ही आचार-विचार, व्यवहार, पहनावे आदि के बारे में भी बताया। प्रशिक्षण के बाद राजधानी के अवधपुरी स्थित मल्होत्रा कॉलेज में एक कार्यक्रम में उनका अभिनंदन किया गया। इसके बाद उन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक आयोजनों की जिम्मेदारी सौंपी गई। ये युवक-युवतियां जब ढोल-ताशे के साथ सुरीली आवाज में सुंदरकांड का पाठ करते हैं, तो सुनने वाले भाव-विभोर हो जाते हैं।
श्री हरि सत्संग समिति एकल अभियान संस्कार की ओर से दिए गए प्रशिक्षण के बाद अब इन युवक-युवतियों का व्यवहार, बोल-चाल, रहन-सहन बदल गया है। उनके हाथों में अब धार्मिक ग्रंथ रहते हैं। उनकी शिखा है और वे माथे पर तिलक धारण करते हैं। वे ज्यादातर समय धर्म-कर्म की बातें करते हैं।

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दलित जनसंख्या के हिसाब से 10 बड़े राज्य

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