चुनाव क़रीब होते हैं तो हम हिंदू बन जाते हैं, बाकी समय हमें चमार और बाल्मीकि समझा जाता हैं

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"चुनाव करीब होते हैं तो हम हिन्दू बन जाते हैं और चुनाव ख़त्म होते ही हमारी पहचान एक बार फिर चमार, झिमर और वाल्मीकि रह जाती है." यह कहना है सहारनपुर के दलित लोकेश का. कैच न्यूज़ संवाददाता रविदास हॉस्टल के अहाते में पेड़ के नीचे लोकेश से बातचीत कर रहे थे. लोकेश सहित क़रीब 80 छात्र 16 कमरों के इस भवन में रहते हैं. ये सब शिक्षक की नौकरी की तैयारी कर रहे हैं.
एक स्थानीय कॉलेज में एमएससी की पढ़ाई कर रहे मोनू कुमार कहते हैं, "हमने भी भाजपा को वोट दिया था. अब देख रहे हैं कि वह क्या कर रही है." धीरे-धीरे और भी लोग हमारे पास इकट्ठा होने लगते हैं और बात बढ़ती नज़र आती है. रविदास हॉस्टल भवन का रंग पीला और सफेद है, जो राजयुग की स्थापत्य कला का नमूना है. लगता है यहां प्रवेश द्वार के पास बना रविदास मंदिर ज़्यादा पुराना नहीं है, क्योंकि इसकी टाइलें पुराने भवन से मेल नहीं खाती.

भीम सेना

युवाओं का झुंड है जो ख़ुद को भीम सेना कहता है. कुछ आस-पास के लोग कहते हैं कि रविदास हॉस्टल भीम सेना की बैठकों का अड्डा है, जहां बैठकर वे अपनी योजनाएं बनाते हैं. शब्बीरपुर गांव में 5 मई की घटना के बाद मंलवार को भड़की हिंसा ने क्षेत्र में व्याप्त जातिवाद को उजागर कर दिया. इसे क्षेत्र में जल्द ही होने वाले निकाय चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

शब्बीरपुर में दलित और ठाकुरों की संख्या बराबर ही है. महाराणा प्रताप जयंती पर जब राजपूत जुलूस निकाल रहे थे, तभी दलितों ने जुलूस पर पथराव कर दिया. इसके जवाब में राजपूतों ने शब्बीरपुर और महेशपुर गांव में कई दलितों के घर जला दिए.
दलितों के सशक्त संगठन भीम सेना का कहना है कि मंगलवार को हुई हिंसा प्रशासन द्वारा दलितों के साथ किए जा रहे भेदभावपूर्ण व्यवहार का नतीजा है. इस समूह के नेता चंद्रशेखर हैं, जो कि पेशे से वकील हैं. उनका दावा है कि उनके समूह के विभिन्न राज्यों में 40,000 से ज़्यादा सदस्य हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि यह आंकड़ा बढ़ा-चढ़ा कर बताया गया लगता है, क्योंकि ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं है कि यह समूह है भी!
इस बीच, रविदास हॉस्टल के युवा भीम सेना के बारे में बात करने से बचते दिखाई दिए. मंगलवार की घटना के बाद से इसके ज़्यादातर सदस्य ग़ायब हैं. इस संगठन के ख़िलाफ़ दो दर्जन से ज़्यादा आपराधिक मामले चल रहे हैं. एसएसपी एससी दुबे कहते हैं एटीएस,एसटीएफ सहित पुलिस की सारी इकाइयां और गुप्तचर शाखाएं मामले की तह तक जाने में लगी हैं. इस मामले में कुछ महत्वपूर्ण गिरफ्तारियां होने की संभावनाएं हैं.
करमचंद (दाहिने) जो सेकंड हैंड कार के व्यवसाय से जुड़े हैं. (सादिक नक़वी/कैच न्यूज़)

शब्बीरपुर की घटना

5 मई की घटना के पीछे एक ठोस वजह यह बताई जा रही है कि स्थानीय लोग गांव के प्रवेश द्वार पर अम्बेडकर की प्रतिमा लगाना चाहते थे, लेकिन राजपूतों ने इसका विरोध किया. अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के उपाध्यक्ष नाथी सिंह ने कहा, "प्रवेश स्थल पर तो दलितों के ही घर बने हुए हैं." सिंह ने कहा, राजपूतों ने इसका विरोध इसलिए किया, क्योंकि उन्हें गांव में प्रवेश करते ही इतनी बड़ी प्रतिमा सामने होना नहीं भा रहा था.
गत पंचायत चुनाव में कई राजपूत उम्मीदवारों के बीच एक दलित उम्मीदवार विजयी हुआ था. सिंह ने बताया कि दलित सरपंच ने स्थानीय पुलिस को चेतावनी दी थी कि अगर महाराणा प्रताप जयंती का जुलूस गांव के बीच से होकर गुजरेगा, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं. पुलिस ने उनकी बातों को तवज्जो नहीं दी और केवल दो ही कांस्टेबल तैनात किए. सरपंच को आशंका थी कि जुलूस पर हमला हो सकता है.
जिले के एक पुलिस अधिकारी ने कहा, "यह अब अभिमान की लड़ाई बन चुकी है." रामनगर के करमचंद का कहना है, "सम्मान का बदला सम्मान और अपमान का बदला अपमान." राजपूतों को यह रास नहीं आ रहा कि दलितों के पास भी अब पैसा आ गया है और वे राजनीतिक स्तर पर आवाज़ उठाने लगे हैं.
मंगलवार को हुई हिंसा में महाराणा प्रताप भवन की निर्माणाधीन दीवार को गिरा दिया गया. (सादिक नक़वी/कैच न्यूज़)

रामनगर ही क्यों?

रामनगर ही वह इलाक़ा है, जहां मंगलवार को हिंसा भड़की थी. कुछ दलितों की भीड़ उस वक्त आपे से बाहर हो गई जब उन्हें गांधी पार्क में ‘चमार पंचायत’ आयोजित करने से मना कर दिया गया. उग्र भीड़ ने निर्माणाधीन महाराणा प्रताप भवन की दीवारें भी गिरा दीं.
रामनगर के ही एक दलित खजान सिंह का कहना है कि "भीम सेना ने सोच-समझ कर रामनगर को निशाना बनाया, क्योंकि यहां गांव वालों पर दलितों का दबदबा है." सूनी पड़ी गलियों और बंद दुकानों की तरफ इशारा करते हुए सिंह ने कहा, "गांव के प्रवेश स्थलों पर जगह-जगह पुलिस तैनात है. ज्यादातर ग्रामीण पुलिस के डर से खेतों में या अन्य गांवों में जा छिपे."
इलाके के करमचंद कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ जो कि ख़ुद एक राजपूत हैं, के मुख्यमंत्री बनने के बाद राजपूत ज़्यादा उग्र हो गए हैं. उनको (राजपूतों को) लगता है कि वे उनके अपने हैं. इस बीच शब्बीरपुर मामले में पुलिस ने 10 राजपूतों को गिरफ़्तार किया है.

बसपा का हाथ?

सहारनपुर बसपा का गढ़ रहा है. केवल पिछले चुनाव ही ऐसे रहे, जहां बसपा को एक भी विधानसभा सीट न मिली हो. पुंडीर ने कहा कि यह हिंसा बसपा नेताओं के बीच उपजे तनाव का नतीजा है. वे दावा करते हैं कि वे युवाओं को भड़का रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि भीम सेना का संबंध भी बसपा से है. वे कहते हैं कि भीम सेना बसपा नेताओं की शह पर उछलने वाले गुंडों का एक समूह है, जिसमें एक पूर्व विधायक भी शामिल है.
वे कहते हैं बसपा को पिछड़ा वर्ग के वोट नहीं मिले, मुसलमानों के वोट नहीं मिले और सबसे महत्वपूर्ण दलितों के वोट तक नहीं मिले. उन्हें केवल जाट वोटों का ही सहारा रह गया है. बसपा खेतिहर मजदूरों और किसानों के बीच भी फूट डालना चाहती है, क्योंकि पार्टी के पास अपनी बची-खुची साख बचाने और भाजपा से मुकाबला करने का बस अब यही एक रास्ता रह गया है. वे कहते हैं भाजपा दलितों को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही. भाजपा, मोदी और योगी की यही कोशिश है कि वे दलितों को हिन्दू बना दें.
और भीम सेना? मोनू कुमार कहते हैं, "दलित राजनेता दलितों के लिए कुछ खास नहीं कर रहे थे. राजनेताओं की अपनी सीमाएं होती हैं. हमारे मुद्दों के लिए वे सड़कों पर नहीं उतर सकते." दरअसल वे यह स्पष्ट करना चाह रहे थे कि भीम सेना क्यों बनी? क्या भीम सेना बसपा की जगह ले सकती है? वे कहते हैं भीम सेना केवल एक सामाजिक संगठन है.
Source: http://hindi.catchnews.com/uttar-pradesh-news-in-hindi/saharanpur-violence-ground-report-we-were-hindus-only-till-polling-dalits-complain-60976.html

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