सदियों पुराने मंदिर ने दलितों के लिए खोले दरवाजे

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सदियों से जिस मंदिर के दरवाजे सवर्णों के अलावा किसी और के लिए नहीं खुलते थे, उसने अब बिना किसी भेदभाव के सबके लिए अपने द्वार खोल देने का फैसला किया है। हरिहरपक्कम गांव और उसके पड़ोस में बसे नम्मांडी गांव की आपसी लड़ाई का नतीजा इतना बेहतर होगा, ऐसा किसी ने भी नहीं सोचा था। हरिहरपक्कम गांव में सवर्णों की आबादी है। पड़ोस के गांव नम्मांडी में एक दलित बस्ती के लोगों के साथ उनका विवाद था। दलितों की मांग थी कि उन्हें भी मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी जाए। आखिरकार अब सबकी आपसी सहमति से इस मंदिर को हर किसी के लिए खोल दिया गया है। अब यहां किसी भी जाति तो क्या, किसी भी धर्म और संप्रदाय के लोग भी दर्शन के लिए आ सकते हैं।




अरुलमिगु थुलुकांतामन मंदिर सदियों पुराना है। दो महीने पहले यहां ताला लग गया था। वन्नियर समुदाय और दलितों के बीच मंदिर में प्रवेश के मुद्दे पर शुरू हुआ विवाद काफी आगे बढ़ गया था। गांव के बड़े-बुजुर्गों ने बुधवार को ग्राम सभा की एक विशेष बैठक बुलाने का फैसला किया। इस बैठक में तय किया गया कि मंदिर के दरवाजे अब सभी के लिए खुले रहेंगे। इसी गांव में रहने वाले एक बुजुर्ग बाबू ने बताया, 'हम कहने जा रहे हैं कि किसी भी जाति या संप्रदाय के लोग पूजा और प्रार्थना के लिए मंदिर में आ सकते हैं। हम बुधवार से यह प्रस्ताव लागू कर देंगे।'

बाबू के साथ गांव के कुछ अन्य वरिष्ठ ग्रामीण चेय्यार के सबकलेक्टर टी प्रभु शंकर से मंगलवार को मिले और उन्होंने मंदिर को फिर से खोलने की अपील की। ग्रामीणों की ओर से उन्हें एक लिखित समझौते की प्रति भी दी गई। इस मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित था। इस परंपरा का टूटना एक ऐतिहासिक घटनाक्रम होगा। तमिलनाडु में कई ऐसे मंदिर हैं जहां दलितों का प्रवेश प्रतिबंधित है। इस मंदिर में दलितों को प्रवेश की अनुमति मिलने के बाद बाकी मंदिरों के भी इस नई परंपरा को अपनाने की संभावना रही है। बाबू बताते हैं कि जब से यह मंदिर बना है, तभी से ही इसमें दलितों के प्रवेश पर मनाही है।

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