दलितों और मुस्लिमों के पिछड़ेपन की अहम वजह है भेदभाव: थोराट

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हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के दलित शोधार्थी रोहित वेमुला की खुदकुशी के बाद देश भर में खड़े हुए आंदोलन की पृष्ठभूमि में शनिवार को जामिया कलेक्टिव नामक संस्था के तहत गुफ्तुगू नाम से आयोजित एक संगोष्ठी में थोराट ने यह भी कहा कि मानवीय विकास के हर सूचकांक के आधार पर यह कहा जा सकता है कि समाज के इन दोनों तबकों के लिए अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा, दलित और मुसलमानों की आज जो आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति है उसकी कई वजहें हो सकती हैं, लेकिन सबसे बड़ी वजह उनके साथ होने वाला भेदभाव है। यह भेदभाव हर स्तर पर देखने को मिलता है। शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में यह पिछड़ापन ज्यादा दिखता है।


देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति एवं धर्म के नाम पर होने वाले कथित भेदभाव को दूर करने की जरूरत पर बल देते हुए थोराट ने कहा, अपने वर्षों के अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि देश के बड़े-बड़े संस्थानों में दलितों के साथ भेदभाव होता है। इसी तरह मुसलमानों के साथ भी भेदभाव होता होगा। कई विश्वविद्यालयों में मैंने देखा है कि दलितों और आदिवासियों के लिए अलग छात्रावास होते हैं। इस तरह का भेदभाव रहेगा तो हम कैसे देश को मजबूत बना सकते हैं। उन्होंने कहा, रोहित वेमुला की खुदकुशी के बाद बहस हो रही है, लेकिन दलित छात्रों की खुदकुशी के मामले लंबे समय से सामने आते रहे हैं। एम्स जैसे संस्थानों में भी दलित छात्र आत्महत्या करते हैं और इसकी असली वजह जाति के आधार पर होने वाला भेदभाव है।


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पद्मश्री से सम्मानित थोराट ने कहा, संविधान में सभी नागरिकों को समान अवसर और समान सुविधाएं मुहैया कराने का वादा किया गया है। परंतु सामाजिक स्तर पर जो विचारधारा और स्थिति है उससे दलितों एवं अल्पसंख्यकों को समान अवसर नहीं मिल पाया है। मानवीय विकास के जितने भी सूचकांक हैं उन सभी को आधार बनाकर देखें तो इन दोनों समुदायों की स्थिति दूसरे वर्गों के मुकाबले बहुत खराब है। थोराट ने कहा, देश में मुस्लिम आबादी 14 फीसदी है, लेकिन उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व चार फीसदी भी नहीं है। अगर दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षण नहीं हो तो शायद इन समुदायों का एक भी सांसद नहीं हो। एएमयू और जामिया के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर चल रही बहस के संदर्भ में यूजीसी के पूर्व प्रमुख ने कहा कि इस मामले में संविधान के दायरे में कोई फैसला होना चाहिए और देश का संविधान अल्पसंख्यक संस्थान की स्थापना और संचालन की पूरी आजादी देता है।
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