क्या सामंतवाद से बाहर निकल पाएंगे हमारे उच्च शिक्षण संस्थान?

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By: Ravish Kumar

हमारे देश में रोजाना दर्जनों प्रदर्शन होते हैं। विधायक से लेकर प्रधानमंत्री के खिलाफ नारेबाजी होती है, उनके पुतले फूंके जाते हैं। पुलिस की अनुमति से या कभी-कभी बिना अनुमति के भी प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री निवास के करीब जाकर नारेबाजी कर आते हैं। लाठी चार्ज होता है, पानी की बौछारें छोड़ी जाती हैं। कई बार हिरासत में लिए जाते हैं और छोड़ भी दिए जाते हैं। हम सब इन प्रदर्शनों को नौटंकी भी समझते हैं और जरूरी भी मानते हैं।



देश भर में यह प्रदर्शन क्रिएटिव होते चले जा रहे हैं। अचानक सैनिकों का समूह जंतर-मंतर से उठकर वित्त मंत्री के घर को घेर लेता है। कभी प्रदर्शनकारी जिनका विरोध करते हैं उनके घर जाकर गुलाब तक दे आते हैं। बल्कि यही हुआ है। पहले शहरों के हड़ताली चौक तक धरना-प्रदर्शन सीमित था लेकिन अब तो मंत्रियों के घर के सामने प्रदर्शन होने लगे हैं। लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि इन प्रदर्शनकारियों को शहर से निकाल दिया गया। इन्हें उस शहर से सात महीने के लिए निलंबित कर दिया गया। इन प्रदर्शनकारियों को अगले एक साल तक प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री निवास के आसपास जाने से मना कर दिया गया। इनके पांव में जीपीएस बांध दिए गए ताकि पता चले कि वे वहां तो नहीं जा रहे हैं जहां नहीं जाने के लिए कहा गया है। क्या आपने कभी ऐसा सुना है। बल्कि धरना प्रदर्शन के दौरान पानी की धार से मार खाकर कई नेता शाम को कुर्ता बदलकर टीवी स्टुडियो में आ जाते हैं और जमकर प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक की आलोचना करते हैं। इन्हें टीवी वाले भी अपने स्टुडियो से नहीं निकालते हैं, कि आप प्रदर्शनकारी हैं, आप विरोध कर रहे हैं। चलिए आपको तीन महीने के लिए चैनल के स्टुडियो से निकाला जाता है। कुछ तो दिमाग लगाइए कि आखिर क्या बात है कि जब विश्वविद्यालय में कोई राजनीतिक गतिविधि होती है, कोई फिल्म दिखाई जाती है या मारपीट ही हो गई तो किस तर्क से छात्रों को होस्टल से, लाइब्रेरी से, कैंपस से और फिर विश्वविद्यालय से ही कई महीनों के लिए निकाल दिया जाता है? ऐसा क्यों है? क्या यह दादागिरी या सामंतगिरी नहीं है कि मारपीट हो जाने या सेमिनार करने या सेमिनार करने से रोकने के लिए छात्रों को सात महीने के लिए कैंपस से निलंबित किया जाए?

दूसरा बड़ा सवाल यह है कि आधुनिक समाज और समय का दावा करने वाले हम यह अपनी आंख से क्यों नहीं देख पाते हैं कि हमारी संस्थाएं आधुनिक हैं भी या नहीं। उनकी सजाएं सामंतवादी और जातिवादी सोच से क्यों मिलती-जुलती हैं। गांव से निकाल देना, कुएं से पानी नहीं पीने देना, मंदिर में घुसने से रोक देना और होस्टल से निकाल देना, लाइब्रेरी में नहीं जाने देना, कैंपस में नहीं आने देना। यह सजा है या सजा के नाम पर उसी मानसिकता की निरंतरता। हम हैदराबाद यूनिवर्सिटी के एक दलित छात्र की आत्महत्या की बात कर रहे हैं। जरूरी है कि हम यह जान लें कि पहले क्या हुआ था।

अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के छात्र नकुल सिंह साहनी की फिल्म 'मुजफ्फरनगर बाकी है' के दिखाए जाने का समर्थन कर रहे थे। यह फिल्म दिल्ली विश्वविद्यालय में दिखाई जानी थी, जहां एबीवीपी ने विरोध किया था। फिल्म दिखाने के समर्थन में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के छात्रों ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी में विरोध प्रदर्शन किया। इस कारण एबीवीपी के नेता ने 'फेसबुक' पर इन छात्रों को गुंडा लिख दिया। बाद में एबीवीपी के नेता ने विश्वविद्यालय के सुरक्षा अधिकारियों के सामने लिखित माफी मांग ली। मगर अगले ही दिन एबीवीपी के नेता सुशील कुमार ने आरोप लगाया कि अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के तीस छात्रों ने उन्हें मारा-पीटा है और वे अस्पताल में भर्ती हैं। यह मामला अगस्त 2015 का है। इन आरोपों की जांच के लिए प्रोक्टोरियल बोर्ड बैठा जिसने पाया कि सुशील कुमार को पीटे जाने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। मौके पर पहुंचने वाले सुरक्षा गार्ड ने भी कहा कि मारपीट की कोई घटना नहीं हुई है, लेकिन वहां पर उन्होंने भीड़ देखी थी। सबूत नहीं मिला फिर भी अंतिम रिपोर्ट में बोर्ड ने पांच दलित छात्रों को एक सेमेस्टर के लिए निलंबित करने का फैसला किया। उसके बाद इन छात्रों ने विरोध किया तो पूर्व वाइस चांसलर ने बुलाकर बात की और सजा को नए सिरे से जांच होने तक के लिए वापस ले लिया। 12 सितंबर 2015 को सजा वापस लेने के बाद पूर्व वीसी ने कहा कि नई कमेटी जांच करेगी। इस बीच 21 सितंबर 2015 को नए वाइस चांसलर प्रो अप्पा राव आ गए, पुराने वाले बदल गए। नए वीसी ने कोई जांच कमेटी नहीं बनाई। विश्वविद्यालय की सर्वोच्च कार्यकारी समिति ने अपने स्तर पर फैसला दे दिया और यह पांच छात्र हास्टल से निलंबित कर दिए गए। उनकी फैलोशिप रोक दी गई।

यह घटना 21 दिसंबर 2015 की है। 21 दिसंबर की सजा पहले की सजा से ज्यादा सख्त कर दी गई, होस्टल से निकालना, फेलोशिप रोकना। इन छात्रों ने हाई कोर्ट में याचिका भी दायर की। जांच नहीं, नई कमेटी नहीं, तो क्या राजनीतिक कारणों से वीसी ने निलंबन का फैसला बहाल किया। यह भी आरोप है कि बीजेपी की एमएलसी ने पूर्व वीसी आरपी शर्मा से मुलाकात की थी। जिसके कारण पहली बार प्रोक्टोरियल बोर्ड की अंतिम रिपोर्ट में इन्हें दोषी ठहरा दिया गया।

बीजेपी सांसद और केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने 17 अगस्त 2015 को मानव संसाधन मंत्री को पत्र लिखा था। विश्वविद्यालय की घटना पर केंद्रीय मंत्री ने जो लिखा है उसका सार इस तरह है-  'पिछले कुछ दिनों से हैदराबाद यूनिवर्सिटी जातिवादी, अतिवादी और राष्ट्रविरोधी राजनीति का गढ़ बन गया है। जब याकूब मेनन को फांसी दी गई थी तो एक प्रमुख छात्र संगठन अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने फांसी के खिलाफ मार्च निकाला था। जब एबीवीपी के नेता ने इसका विरोध किया तो उनके साथ मारपीट हुई और नतीजे में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। दुखद बात है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ऐसी चीजों को चुपचाप देखता रहा। मेरे लिखने का उद्देश्य यह है कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी में जो हो रहा है उससे अवगत कराया जाए। मुझे पूरी उम्मीद है कि आपके नेतृत्व में कैंपस में चीजें बेहतरी के लिए बदलेंगी।'

छात्रों का कहना है कि इन राजनीतिक दबावों के कारण मारपीट और चोट के सबूत न होने के बाद भी छात्रों को दोषी ठहराया गया और उन्हें निलंबित किया गया। दस दिनों से यह छात्र हास्टल के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे और अपना निलंबन वापस लिए जाने की मांग कर रहे थे। किसी ने उनसे बात करने का प्रयास किया या नहीं, यह अब जांच का विषय है। यह भी जांच होनी चाहिए कि विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने इन छात्रों का साथ दिया या नहीं। यह भी जांच होनी चाहिए कि विश्वविद्यालय के दलित शिक्षकों ने इनका साथ दिया या नहीं। क्या वे सब भी चुप रहे, सिर्फ इसलिए कि वीसी की सत्ता को चुनौती नहीं दी जा सकती।

28 साल उम्र थी रोहित वेमुला की। रोहित उन पांच छात्रों में से एक था जिन्हें होस्टल से निलंबित किया गया था। उसकी फैलोशिप सात महीने से रोक दी गई थी। रोहित की मां दर्जी का काम करती है और उसका परिवार गुंटूर के एक गांव का रहने वाला है। बेहद गरीब परिवार से आने वाला छात्र रोहित पढ़ने लिखने में काफी अच्छा था। रोहित ने रविवार को आत्महत्या कर ली। उसने हमारे, आपके लिए एक पत्र लिखा है। इस पत्र को हम और आप कई तरह से पढ़ सकते हैं, पढ़ेंगे ही। लेकिन जरा सोचिए अगस्त 2015 का मामला क्या 18 जनवरी 2016 तक नहीं सुलझाया जा सकता था। जाहिर है इस मामले में राजनीति तो हुई है। अगर विश्वविद्यालय ईमानदार प्रयास करता तो दोनों गुटों में सुलह करा सकता था। जिस विश्वविद्यालय से ऐसे मामले नहीं सुलझ सकते, रोहित की खुदकुशी उसकी प्रशासनिक क्षमता और नीयत पर भी सवाल करती है। क्या इस मामले को खींचकर विश्वविद्यालय ने रोहित को वह सब कहने के लिए मजबूर नहीं किया जो उसने इस चिट्ठी में लिखा है। गुडमार्निंग कहा है इसलिए सुनने के पहले थोड़ा जाग जाइएगा।

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