मीटिंग के दौरान दलितों को जमीन पर बैठाया, खुद कुर्सी पर डटे रहे नेता-अधिकारी

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दूसरी जगहों से होते हुए भेदभाव थानों में भी घुस गया. दलितों को बुलाया. उनसे साफ़-सफाई की अपेक्षा की. बातें करने के लिए बुलाया और ज़मीन पर बैठा दिया. चुनाव के समय हाथ जोड़कर वोट मांगने वाले जनप्रतिनिधि भी कुर्सियों पर बैठे थे, लेकिन किसी ने भी दलितों को खाली पड़ी कुर्सियों पर बैठाने की जहमत नहीं उठाई। ज़मीन पर बैठे दलितों की ये तस्वीर हकीकत है उस सोच की जहां ये आज भी अछूत हैं. यह तस्वीर बता रही है कि छुआछूत का कीड़ा यहाँ भी मौजूद है. बड़े शहरों के बड़े संस्थानों में पढ़े-लिखे दलित हो या छोटी जगहों के एक छोटे से थाने में बिना पढ़े लिखे दलित. दलित होने का दर्द इन सब को कभी न कभी जरुर महसूस करना पड़ता है. मेरे हिसाब से दलितों को अगर सबके सामने ज़मीन पर बैठाया जा रहा हो, तो उन्हें वहाँ से चले जाना चाहिए. आप ज़मीन पर बैठते ही क्यों हो. आप भी इंसान हो. आप भी उसी प्रकृति की देन हो, जैसे सब हैं. फिर ज़मीन पर क्यों बैठते हो? आपको ज़मीन पर बैठाने का अधिकार इन्हें किस संविधान, किस व्यवस्था, किस धर्म ने दिया?

http://www.bhaskar.com/news/UP-untouchability-shown-in-bundelkhand-dalits-sit-in-ground-5118738-PHO.html

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