उत्‍तर प्रदेश में पी.सी.एस से चुनकर आई दलित महिला अफसर का हो रहा उत्‍पीड़न

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पुरातन भारत में जातियां वर्ण व्यवस्था की हिस्सा थी, लेकिन 67 साल पहले आजाद भारत में हर इंसान को समान अधिकारों के साथ जीने के लिए लोकतंत्र की व्यवस्था की गई। इस लोकतंत्र को ठेंगा दिखाकर आज भी सरकारी सिस्टम के अधिकारी कुछ जाति के अफसरों को बेइज्जत करने से बाज नहीं आते।

उत्‍तर प्रदेश पीसीएस सेवा से चुनकर बुलंदशहर पूर्ति विभाग में निरीक्षक बनकर आई एक दलित महिला को यही दंश झेलना पड़ा है। डीएसओ डीपी त्रिपाठी इस महिला को उसके दलित होने की वजह से रोज बेइज्जत करते है।
यूपी में गाजियाबाद के गरीब दलित परिवार की बेटी कृष्णा कुमारी पढ़ी-लिखी युवती हैं। वह नेट क्वालिफाइड हैं और हाल ही में यूपी पीसीएस सेवा से पूर्ति विभाग में निरीक्षक के पद पर चुनी गई हैं, लेकिन बुलंदशहर में अपनी तैनाती के तीन महीनों के अंदर ही उन्हें गुलाम भारत की मानसिकता का सामना करना पड़ा है।

विभाग के मुखिया जिला पूर्ति अधिकारी द्वारिकाप्रसाद त्रिपाठी उनके दलित के होने के कारण उनसे घृणा करते है। उन्हें जातिसूचक शब्दों के साथ संबोधित करते हैं। यहां तक कि उनके काम को भी पसंद नही किया जाता। शुरू-शुरू में डीएसओ ने कृष्णा के साथ अभद्रता करने की कोशिश की।

आजाद भारत में पैदा हुई कृष्णा ने अपने जीवन में कभी ऐसा माहौल नहीं देखा, लेकिन उनका उत्पीड़न तीन महीनों से जारी है। डीएसओ द्वारिकाप्रसाद त्रिपाठी के हाथ जितने भी अधिकार है, वह उन अधिकारों का कृष्णा के खिलाफ खुलकर इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें समय से आने पर भी डीएसओ के सामने पेश होना पड़ता है।

अब हालात इतने बदतर हो गए हैं कि स्टाफ मीटिंग से कृष्णा को बाहर निकाल दिया जाता है। उन्हें निरीक्षक होते हुए आफिस का काम दिया गया है। डीएसओ की निम्न मानसिकता के कई पुख्ता प्रमाण उनके पास मौजूद है। अपने साथ हुई ज्यादती की शिकायत उन्होने जिलाधिकारी से भी की है।

डीएम के आदेश पर एडीएम प्रशासन को इस मामले की जांच सौंपी गई है, लेकिन जांच पूरी होने से पहले ही डीएसओ डीपी त्रिपाठी कृष्णा को विक्षिप्त और पागल करार दे रहे है।

यूजीसी नेट क्वालीफाइड कृष्णा असिस्टेंड प्रोफेसर बनना चाहती थी, लेकिन पीसीएस परीक्षा पास करने के बाद उन्होने निरीक्षक का पद अपने घर की खराब आर्थिक स्थिति के कारण स्वीकार किया, लेकिन यहां कृष्णा को मिली उपेक्षा ने उन्हें मानसिक तौर पर परेशान किया है।

अब उनके सामने दो ही विकल्प है। पहला अपने आत्मसम्मान के लिए डीएसओ के खिलाफ कानूनी लड़ाई और दूसरा बुलंदशहर से खुद का ट्रांसफर करवलें। इसी तरह का एक मामला पंजाब में कुछ दिन पूर्व सामने आया था जिसमें एक दलित प्रोफेसर को कुछ ऊँची जाती के प्रोफेस्सोर्स ने  बैठने के लिए कुर्सी भी नसीब नहीं होने दी थी

Source: http://hindi.news18.com

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