अध्यापकों ने दलित बच्चों को पूजा करने से रोका

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में इस ब्लॉग पर दलितों को मंदिरो में पूजा करने से रोकने की कई घटनाओं का जिक्र कर चुका हूँ। और ऐसा कोई नयी बात नहीं हैं भारतीय संस्कृति जो की ब्राह्मणबाद का ही दूसरा रूप हैं दलितों के मंदिर प्रवेश को गलत मानती हैं।

उड़ीसा में एक ऐशी घटना घाटी हैं जिसको सुनकर ही आप सोचने पर मज़बूर हो जायेंगे। देश को आज़ाद हुए 68 साल हो चुके हैं लेकिन देश को जातिवाद से अभी भी आज़ादी नहीं मिली हैं। राज्य के केंद्रपाड़ा जिले के एक सरकारी स्कूल में दलित विद्यार्थियों को कथित तौर पर भगवान गणेश की पूजा नहीं करने दी गयी। पूजा करने से रोकने वाला कोई और नहीं बल्कि उस स्कूल के 4 अध्यापक ही हैं। इनमें स्कूल का हेड मास्टर भी शामिल था।

 
पट्टामुंडई थाने के तहत अंदारा उच्च प्राथमिक विद्यालय के करीब 30 दलित बच्चों को गुरुवार को गणेश चतुर्थी के मौके पर कथित तौर पर नारियल फोड़ने और गणेश पूजन करने से रोक दिया गया, जबकि ऊंची जाति के बच्चों को पूजा करने दी गई। 

मामले की शिकायत खुद पीड़ित बच्चो ने दर्ज़ करवाई हैं जिनमें 10 लडकिया भी हैं। शिकायत के बाद पुलिस ने अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1973 के तहत एक मामला दर्ज किया है।

इस घटना से सिद्ध होता हैं की जातिवाद हमारे स्कूलों में सिखाया जाता हैं। कभी दलित बच्चो को मिड-डे मील का खाना सवर्ण बच्चो के साथ नहीं परोसा जाता तो कभी उन्हें संस्कृत कार्यक्रमों में शामिल नहीं होने दिया जाता। 

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