बसपा गैर दलितो द्वारा दलितो से भूमि खरीदने में संसोधन वाले कानून का विरोध करेगी !!

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बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री, सुश्री मायावती जी ने उत्तर प्रदेश में दलितों की ज़मीन ग़ैर-दलितों द्वारा खऱीदे जाने पर लगी क़ानूनी रोक को समाप्त करने संबंधी प्रदेश समाजवादी पार्टी सरकार द्वारा हाल ही में लिये गये फैसले की तीखी आलोचना करते हुये कहा कि यह घोर दलित-विरोधी फैसला है। उन्होंने कहा कि सपा सरकार दलितों को पूर्ण रूप से भूमिहीन बनाये रखने की जातिवादी सोच व साजि़श का ही परिणाम है और इससे अब ख़ासकर सपा के गुण्डों व माफिय़ाओं द्वारा प्रदेश भर में दलितों की ज़मीन पर जबरन क़ब्ज़ा करने की होड़ लग जाने की आशंका बढ़ गई है।

इस अवसर पर बसपा सुप्रीमों मायावती ने कहा कि वैसे तो दलित समाज के लोग इस देश में व्याप्त वर्ण व्यावस्था के कारण सदियों से ही भूमिहीन रहे हैं, परन्तु परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के अथक प्रयासों के कारण यहां देश में उनके द्वारा बनाये गये मानवतावादी संविधान व उसमें आरक्षण की व्यावस्था के कारण देश की आज़ादी के बाद इस शोषित वर्ग के लोग जो थोड़ी भूमि अपनी रोज़ी-रोटी के लिये अर्जित कर पाये हैं, उसे भी उत्तर प्रदेश की सपा सरकार अपनी जातिवादी सोच व ज़हरीली नीति के कारण उन दलितों से छीन करके उन्हें आजीवन भूमिहीन ही बने रहने को विवश करना चाहती है।
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दलित महिला अपने खेत में काम करते हुए 
इसी कारण संबन्धित क़ानून में संशोधन करने का प्रस्ताव उत्तर प्रदेश मंत्रिमंण्डल द्वारा दिनांक 4 अगस्त सन् 2015 को पारित किया गया है। जबकि उत्तर प्रदेश ज़मीनदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था क़ानून, 1950 की धारा 157 (क) में स्पष्ट प्रावधान है कि अनुसूचित जाति के भूमिधर व्यक्ति कलेक्टर की पूर्व स्वीकृत के बिना दलित वर्ग के व्यक्ति के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को ना तो ज़मीन बेच सकते हैं और ना ही दान, बंधक, या पट्टा द्वारा अंतरित कर सकते हैं। साथ ही, कलेक्टर दलित समाज के व्यक्ति को किसी अन्य वर्ग के लोगों को ज़मीन बेचने की अनुमति तभी दे सकते हैं जब दलित के पास कम-से-कम 1.26 हेक्टेयर से अधिक ज़मीन हो। 

इतना ही नहीं, बेचने के बाद भी इतनी ही ज़मीन उसके पास बची भी रहनी चाहिये। इसी ही क़ानूनी प्रतिबंध के कारण दलित समाज के कुछ लोगों के पास आज थोड़ी भूमि बच पायी है, वरना इस वर्ग की ज़्यादातर आबादी भूमिहीन हैं और खेतिहर मज़दूरी व दैनिक मजदूरी करके अपना जीवन किसी प्रकार गुजऱ-बसर करने को विवश हैं। 

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