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'अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत'
कबीर कह गए हैं. लेकिन विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) और बजरंग दल शायद पढ़ न पाए हों इस दोहे को. बवाल मचाए जा रहे हैं. जो हो चुका उसे पलटने की कोशिश कर रहे हैं. क्या फायदा? 'घाव' भरने से तो रहा! 100 दलित परिवारों ने 'दिलवालों की दिल्ली' के बीचोबीच जंतर-मंतर पर आकर अपना धर्म परिवर्तन करवाया - इस्लाम को अपनाया. अब इनकी छातियां फटने को है. कहते हैं इनकी 'घर वापसी' करवाएंगे.


100 दलित परिवारों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर आकर अपना धर्म परिवर्तन करवाया. अब वीएचपी और बजरंग दल हाय-हाय कर रहे हैं... लेकिन दलितों की समस्या पर यह हाय-तौबा क्यों नहीं?
राजधानी दिल्ली से मात्र 162 किलोमीटर दूर है हिसार. हरियाणा के इस जिलें में है इन दलितों का गांव - भगना. न जाने कितनी सदियों से ये परेशान रहे होंगे जाति व्यवस्था से लेकिन पिछले तीन वर्षों से ये जाट परिवारों की ज्यादतियों से हो रही परेशानी को उठा रहे थे. अरविंद केजरीवाल से भी मिले थे पिछले साल. जाहिर सी बात है, यह बात वीएचपी और बजरंग दल से छिपी न रही होगी. आरएसएस से तो और भी नहीं, उसकी तो शाखाएं हैं गांव-गांव में. तब आपने इनकी सुध क्यों नहीं ली? ये भी तो आखिर हिंदू ही हैं, हैं या नहीं?
खैर मुझे पता है कि आप लोग मेरे इस 'हैं या नहीं' सवाल का जवाब नहीं देंगे. क्योंकि वीएचपी के एक नेता प्रदुमन कुमार का कहना है कि इन दलित परिवारों को लोभ और लालच के दम पर इस्लाम कबूल करवाया गया है. अगर ऐसा है तो 80-90 करोड़ हिंदुओं के देश में आपका इस महान 'काम' के लिए बजट कम पड़ जाता है क्या? आप भी लालच दें. अपनी संख्या 100 करोड़ के पार ले जाएं... रोका किसने है? लेकिन नहीं, आप भी जानते हैं, समस्या बजट की तो है ही नहीं साब! समस्या है तो सिर्फ मानसिकता की.
नहीं समझे! ज्यादा दूर क्यों जाना है, इसी खबर के माध्यम से समझ लीजिए. अप्रैल 2012 में इसी गांव में जाटों और दलितों के बीच भयंकर टेंशन हुआ था. कारण था कि पंचायत ने जाटों का साथ देते हुए एक दीवार खड़ी कर दी थी, जिससे कुछ दलितों के घरों के आने-जाने के रास्ते बंद हो गए थे. यहीं पर आपकी मानसिकता झलकती है साब, यहीं पर. आपको दलित हिंदुओं की संख्या से तो प्यार है, लेकिन उनके दिलों पर राज करने का दिल आपके पास नहीं.
गाहे-बेगाह आप कभी मुल्लों पर तो कभी पादरियों पर लोभ-लालच के दम पर धर्मांतरण करने का आरोप लगाते रहते हैं. मदर टेरेसा पर भी आरोप लगाया - सेवा कीं तो धर्मांतरण के उद्येश्य को ध्यान में रखते हुए. लेकिन यही सेवा भाव आपके अंदर क्यों नहीं? गरीब, दबे-कुचले मुस्लिम बहुल इलाके, शहरी सुविधाओं से मीलों दूर आदिवासी बहुल इलाकों में आप क्यों नहीं चले जाते 'सेवा' करने? 'सेवा' कीजिए, 'मेवा' पाइए - एकदम सपाट है यह सिद्धांत. हिंदुओं की संख्या में वृद्धि होगी. देश आपको युगों-युगों तक याद रखेगा.  
एक सिद्धांत और है - ऐसा समाज बनाएं, जहां तथाकथित ऊंची जातियों को दलितों के साथ जोर-जबरदस्ती करने पर उनका धर्मांतरण कर दिया - जबरन. कर पाएंगे???

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