जनगणना में गड़बड़ी करके दलितों का वजूद ही मिटा दिया!

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जनगणना के जिन आंकड़ों से पूरे देश की तमाम योजनाएं बनती हैं, अगर उसमें ही खामियां होंगी तो देश के नीति निर्धारक जनता को वह सबकुछ कैसे दे पाएंगे, जिनकी प्लानिंग मेक इन इंडिया के माध्यम से तैयार होने जा रही है। जी हां जनगणना 2011 में मुरसान ब्लाक की ग्राम पंचायत नगला गजुआ के राजस्व गांव नगला गजुआ से दलितों का वजूद ही मिटा दिया गया। दैनिक जागरण में छपी खबर के अनुसार यह घटना उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले की हैं। 

इस गांव में करीब 60 से 65 परिवार अनुसूचित जाति के रहते हैं, लेकिन जनगणना के आंकड़ों में यहां से इनकी संख्या जीरो दिखाई गई है। इन परिवारों के वयस्क लोगों के ग्राम पंचायत व विधान सभा मतदाता सूची में नाम शामिल हैं, जिससे फिलहाल इनके वोट तो नहीं कटे हैं, लेकिन वे सरकार की अन्य योजनाओं के लाभ से वंचित हो सकते हैं। इससे आगामी पंचायत चुनाव में सीट आरक्षण की व्यवस्था भी इससे प्रभावित हो सकती है।

जनगणना भारत सरकार का डाटा है। इसमें बदलाव तो अगली जनगणना में ही हो सकता है। दलितों के परिवार छूटने से मतदान का अधिकार तो मिलेगा, लेकिन यह परिवार अनुसूचित जाति व व्यक्तिगत लाभार्थीपरक की तमाम योजनाओं से प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि स्पेशल कंपोनेंट की स्कीम गांव की दलित आबादी के हिसाब से ही शासन से मिलती है। जब आंकड़ों में इनकी आबादी का आंकड़ा जीरो होगा तो शासन की योजनाओं का लाभ मिलना कठिन होगा।

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