दलित कैमरा: दलितों की आवाज़

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यू ट्यूब पर 'दलित कैमरा' नाम से एक चैनल है, जो भारत के दलितों को समर्पित है। दलितों के लिए यह अपनी बात रखने का एक ज़रिया बन गया है।  
हिंदू जाति व्यवस्था में दलितों को सबसे नीचे और ग़रीब माना जाता है। भारत की आबादी में उनकी हिस्सेदारी क़रीब 16 फ़ीसदी है। कई बार उनकी इच्छा के खिलाफ उन्हें काम करने और कम भुगतान लेने के लिए मजबूर किया जाता है। कई सकारात्मक परियोजनाओं के बाद भी दलितों को लगातार भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। 
दलित कैमरा, एक अछूत की नजर से भारत में जीवन की सच्चाइयों को देखने और उनके ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण का एक प्रयास है। इसकी स्थापना भाथरन रविचंद्रन ने की थी। वे आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद की इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेज़ यूनिवर्सिटी (ई.एफ़.ए.लयू.) में अंग्रेजी विषय में शोध कर रहे हैं। 
दलित कैमरा का लोगो 
चार साल पहले बने इस चैनल को 23 लोगों की एक टीम चलाती है। इस टीम के पास चार वीडियो कैमरे हैं और 14,00 लोग इसके ग्राहक हैं. इसके कुछ वीडियो को 50 हज़ार से भी अधिक बार देखा गया है। रविचंद्रन हाथ से मैला साफ़ करने वाली जाति के हैं। ये लोग उन घरों से मानव मल को अपने हाथों से हटाते और उठाते हैं, जिनमें आधुनिक शौचालय नहीं हैं। 
दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के अपने ज़िले में इतनी अधिक शिक्षा पाने वाले वे इस जाति के पहले व्यक्ति हैं। वो बताते हैं कि विश्वविद्यालय परिसर में 20 छात्रों के एक समूह ने उन पर हमला किया था। इसके बाद से उन्होंने दलित उत्पीड़न की घटनाओं की वीडियों रिकार्डिंग शुरू की। 

दलित आंदोलन और दलित उत्पीड़न की घटनाओं को मुख्य धारा की मीडिया में जगह नहीं मिलती है। इसलिए दलित कैमरा के जरिए उन्होंने दलितों को इंटरनेट पर एक आवाज़ देने का फ़ैसला किया।
दलित कैमरा न केवल दलित महिलाओं की दुर्दशा बल्कि बल्कि अन्य विवादास्पदों मुद्दों पर भी सूचनाएं उपलब्ध कराता है। इस चैनल पर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक अरुंधति रॉय, दलित संगीत, दक्षिण भारतीय सिनेमा उद्योग में पुरुषों के वर्चस्व पर बोलने वाली एक सी ग्रेड अभिनेत्री का भी वीडियो है.
इससे पहले दलितों की आवाज उठाने के किसी अन्य प्रयास को ऐसी सफलता मिलती नहीं दिखी है।साल 1997 में पुनिता पांडियन ने तमिलनाडु में 'दलित मासुरा' के नाम से एक अख़बार शुरू किया था लेकिन वह चल नहीं पाया। क्योंकि दुकानदार उसे बेचने से मना कर देते थे।  वे अपने आप को दलित संघर्ष से नहीं जोड़ना चाहते थे। 
साल 2011 में यू ट्यूब पर लांच होने के बाद से दलित चैनल ने आंध्र प्रदेश के बाहर भी लोगों को आकर्षित किया है। यह चैनल केरल और पश्चिम बंगाल में पहले से ही मशहूर है। अब यह धीरे-धीरे अन्य राज्यों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मशहूर हो रहा है। 

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