दलित समस्याओं के समाधान के लिए सार्थक पहल की आवश्यकता

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पिछले दिनों हरियाणा के हांसी के मिर्चपुर गांव के दलितों के अनेक घर गांव के दबंगो के जरिए जला देने के बाद दलित समस्या एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। एक सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर कब तक दलित उच्च वर्गों के जरिए उत्पीड़ित किए जाते रहेंगे। कब वे दूसरी जातियों की तरह आर्थिक और सामाजिक रूप से बेहतर होंगे और वह भी समाज में उसी तरह सम्मान के साथ निडर होकर जी सकेंगे जैसे समाज के अगड़े जी रहे हैं। इसी के साथ शासन की लापरवाही कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। क्या कारण है आजादी के 64 वर्षों के बाद भी दलितों पर उत्पीड़न जारी है। इसी के साथ दलितों की हितों को लेकर अनेक संगठन धरना-प्रदर्शन करके अपना विरोध दर्ज कराने में लगे हैं। देखा जाए तो दलितों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लागू की गईं योजनाओं के अपेक्षित परिणाम वैसे नहीं आ रहे हैं जैसे आने चाहिए। जिस आक्रामकता के साथ दलित समस्याओं को उठाया जा रहा है उससे यह साफ हो गया कि अब दलितों के प्रति बरती जा रही उपेक्षा को ज्यादा दिन तक दलित समाज और संगठन बर्दास्त नहीं करेगा। इससे यह बात साफ हो गई है कि सरकारी और गैरसरकारी प्रयासों की समीक्षा बिना किसी आग्रह या दुराग्रह के करने का वक्त आ गया है।
भारत में सामाजिक जातिगत और आर्थिक विषमता इस कदर गहरी है कि ऐसे बहुत कम लोग हैं जो दलितों को सामाजिक और आर्थिक रूप से बेहतर होते हुए खुश होते हों। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा दलितों की बेहतरी के लिए जो योजनाएं लागू की जाती हैं, वे अधिकांशतः भ्रष्टाचार का शिकार हो जाती हैं। इसलिए सरकार द्वारा जरूरतमंदों के लिए जारी धन इतनी देर में और इतने कम तादाद में पहुंच पाता है कि उससे उनकी बेहतरी की आशा नहीं की जा सकती है। उदाहरण के तौर पर मनरेगा को ही ले लें। सरकार द्वारा गांव के बेरोजगारों को 100 दिन की रोजगार की गारंटी देने वाली इस योजना के लिए आवंटित धन अधिकांश जिलों में जरूरतमंद लोगों के पास नहीं पहुंच पा रहा है और इस्तेमाल के पहले ही भ्रष्टाचार का शिकार हो जाता है। इसे ग्रामीण विकास मंत्रालय की संसदीय समिति के सर्वेक्षण रपट में भी स्वीकार किया गया है। इसी तरह दलितों के मैला ढोने के कार्य को समाप्त करने की तमाम घोषणाओं के बावजूद अभी भी बड़ी तदाद में शहरों और कस्बों की दलित महिलाएं इस अमानवीय-प्रथा से मजबूरीवश लगी हुई हैं। जबकि केंद्र और राज्य सरकारें इस कुप्रथा को जड़ से ही खत्म करने के दावे करतीं रहीं हैं। जाहिर है जब तक राज्य और केंद्र सरकार इनके रोजगार और आय के दूसरे साधनों की मुकम्मल व्यवस्था नहीं करते, इस घृणित-प्रथा से उन्हें छुटकारा दिला पाना मुश्किल का काम है। गांवों में दलित खेतीहर मजदूर के रूप में आज भी शोषण का शिकार हो रहा है। इसके अलावा लाखों की तादाद में बंधुआ मजदूर के रूप में दलित शोषित हो रहा है। जिन 75 लाख परिवारों के पास अपनी हकदारी का आवास न होने की बात सरकार मानती है उनमें से ज्यादातर दलित तबके के ही लोग हैं। गांवों में भूमि-सुधार की जो पहल आजादी के बाद की गई थी(विनोबा भावे ने एक सार्थक पहल आजादी के बाद भूमि-सुधार को लेकर बिहार और दूसरे कई राज्यों में की थी जिसके सार्थक परिणाम निकले थे) वह कारगर नहीं हो पाई, जिसका परिणाम यह हुआ कि गांव का दलित आज भी तमाम कोशिशों के बावजूद खेती के काबिल जमीन से लगभग महरूम है। गांव-गांव में पानी के संकट से निजात दिलाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने चापाकल(हैंडपंप) लगवाने की जो योजनाएं लागू की उससे बहुत बड़ी तादाद में दलितों को लाभ तो हुआ है, लेकिन अभी भारत के हजारों दलित गांव ऐसे हैं, जहां न तो चापाकल पहुंच पाया है और न ही बिजली के तार ही लग पाए हैं। इसके अलावा और भी तमाम समस्याएं हैं, जिससे गांव का दलित रोजाना रूबरू होता रहता है।
यह सच है कि अभी भी दलित समाज भारतीय समाज के दूसरे तबकों से कई मायने में बहुत पीछे है, लेकिन यह भी सच है कि आजादी के बाद दलित समाज को जो सरकारी, संवैधानिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक अधिकार हासिल हुए वे हजारों वर्षों में पहली बार हासिल हुए। इसलिए दलित संगठनों को अपनी आक्रमकता के वक्त इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि दलित उत्थान और उनकी बेहतर स्थिति जो अब है, वह भारत के इतिहास में कभी भी नहीं थी। गांवों में जहां उन्हें कुएं का पानी भरना दूर, कुएं पर चढ़ने की भी मनाही थी, वहां पर अब वह निडर होकर(कुछ अपवादों को छोड़ दे) पानी भरता है। जहां पर वह शादी-ब्याह में शान-शौकत नहीं दिखा सकता था, अब वह अपनी मर्जी से खूब धूमधाम से विवाह संपन्न कराता है। दलित शासन और प्रशासन के उस ऊंचाई पर पहुंच गया है, जहां आजादी के पहले उसके पूर्वज कभी स्वप्न में भी शायद सोचे होंगे।
आजादी के बाद से ही दलितों के किसी आयु-वर्ग के व्यक्ति के साथ भेदभाव करना एक बहुत बड़ा अपराध माना गया। इसे बाकयदे संविधान में शामिल किया गया। जो अधिकार दलितों के बच्चों और महिलाओं को आजादी के बाद हासिल हुए, वे उन्हें हर तरह से आगे बढ़ने की गारंटी और सुरक्षा दोनों देते हैं। इसी तरह दलित लड़कियों और लड़कों के शिक्षा और नौकरी के लिए शासन ने जो सुविधाएं दी हुईं है, यह उनके प्रति शासन की सहिष्णुता और उनके प्रति संवेदना नहीं तो क्या कहा जाएगा? मतलब ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां दलितों को विशेष दर्जा न हासिल हो। इसके बावजूद दलितों पर अत्याचार देश के हर हिस्से में होते रहते हैं। इस पर केंद्र और राज्य सरकारों को सिद्दत से सोचना होगा।
बाबा साहब भीम राव अंबेडकर ने दलितों की अत्यंत खराब स्थिति के कारण ही संविधान में इनके लिए जगह-जगह आरक्षण की व्यवस्था की थी। उसका फायदा इन्हें पिछले 64 वर्षों में शासन, प्रशासन, शिक्षा, रोजगार, रोटी, कपड़ा और मकान में लगातार मिलता आ रहा है। आज दलितों की बेहतर होने स्थिति के लिए डॉ. अंबेडकर का दलित समाज श्रेणी है। लेकिन अभी भी समाज में इन्हें वह बेहतर स्थिति हासिल करनी है जो बाबा साहब चाहते थे। लेकिन इन्हें हासिल करने के लिए आक्रमकता की जगह बुध्दि और विवके से आगे बढ़ना ज्यादा मुफीद होगा। अंबेडकर ने शिक्षित
हो, आगे बढ़ो, और संषर्घ करो का जो नारा दिया था, उसमें आक्रमकता की कोई जगह नहीं है। गांधी जी भी हिंसा या आक्रमकता के जरिए धन, अधिकार और सम्मान हासिल करने के हमेशा खिलाफ थे। इसीलिए वे किसी भी समस्या का हल ढूढ़ने में हमेशा अहिंसा और सत्याग्रह का ही सहारा लेते थे। यह सही है कि आजादी के बाद अहिंसा और सत्याग्रह के जरिए शासन तक अपनी बात पहुंचाने की गुजाइश बहुत कम हो गई है, लेकिन यह भी सही है कि हिंसा या आक्रमकता किसी समस्या का संपूर्ण और अंतिम हल नहीं है। इसलिए दलितों के हक की लड़ाई लड़ते वक्त दलित पार्टियां और संगठन आक्रमक रुख अपनाने से पीछे नहीं हटते हैं।
अच्छा यह हो कि दलित संगठनों को दलितों की समस्याओं, उनके साथ हो रहे अन्याय और शोषण की चर्चा करते वक्त संविधान और शासन द्वारा दी गई मदद और मिले अधिकारों की भी बात को स्वीकार करना चाहिए। इससे ही दलितों के प्रति जहां एक स्वस्थ नजरिया बनेगी वहीं पर समस्याओं को उठाने पर उसे शासन और प्रशासन के अलावा जन सहयोग भी पूरी तरह से सिद्दत के साथ मिल सकेगा। आज दलित वर्ग का व्यक्ति लोक सभा अध्यक्ष से लेकर गवर्नर तक जैसे महत्वपूर्ण पदों तक पहुंच चुका है। यानी हर क्षेत्र में दलित समाज आगे कदम बढ़ा चुका है, बावजूद उनके साथ भेदभाव और अत्याचार अभी खत्म नहीं हुए हैं। समाज के इस सबसे निचले तबके के साथ जब तक पूरा सम्मान और सद्भावना नहीं हासिल होता, इनके साथ न्याय नहीं हो सकता।

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